ब्राह्मण विकास परिषद की अपील: मंदिर जीर्णोद्धार में न हटाई जाए माता जी की मूल मूर्ति, शास्त्रों का दिया हवाला
मऊ। घोसी। शीतला माता मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार और गर्भगृह के विस्तार को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय सामने आया है। माता जी की मूल मूर्ति (विग्रह) के विस्थापन और पुनर्प्रतिष्ठा को लेकर 'ब्राह्मण विकास परिषद' के अध्यक्ष ऋषिकेश पांडेय ने सभी सनातन प्रेमियों और श्रद्धालुओं के समक्ष शास्त्रों की मर्यादा और धार्मिक आस्था से जुड़े कई गंभीर तथ्य रखे हैं। परिषद का स्पष्ट मानना है कि सदियों पुरानी जागृत मूल मूर्ति को अपने स्थान से हटाना न तो शास्त्रीय दृष्टिकोण से उचित है और न ही जनभावनाओं के अनुकूल।
विस्थापन से खंडित हो सकती है मर्यादा: जटिल हैं कर्मकांडीय नियम
पत्र में शास्त्रीय एवं कर्मकांडीय मर्यादाओं का विशेष उल्लेख करते हुए बताया गया है कि किसी भी जागृत शक्तिपीठ से भगवती की मूर्ति को हटाना कोई सामान्य बात नहीं है।
शक्ति दीक्षा की अनिवार्यता: शास्त्रों के अनुसार, शक्ति की मूर्ति को विस्थापित या पुनः प्रतिष्ठित करने का अधिकार केवल उसी आचार्य को होता है जिसने विधिवत 'शक्ति दीक्षा' ली हो।
दोगुनी जटिल प्रक्रिया: मूर्ति स्थापना की तुलना में उसे वहां से हटाने और दूसरी जगह स्थापित करने में दोगुनी कठिन प्रक्रियाओं (जैसे अंतर-मातृका, बहिर्-मातृका और विभिन्न न्यास) का पालन करना पड़ता है, जो अत्यंत जोखिम भरा है।
'निर्माल्या' होने का खतरा: दोबारा पूजा नहीं होगी संभव:
सबसे बड़ा धार्मिक संकट यह है कि बिना तत्व धारण और विधिवत विसर्जन के मूर्ति को स्पर्श भी नहीं किया जा सकता। यदि नियमों के अनुसार भगवती का विसर्जन किया जाता है, तो वह मूल मूर्ति 'निर्माल्या' (भाव-रहित या विसर्जित वस्तु) की श्रेणी में आ जाती है।
शास्त्रों के अनुसार, निर्माल्या वस्तु देवताओं को स्वीकार्य नहीं होती। ऐसी स्थिति में पुरानी मूर्ति की दोबारा पूजा संभव नहीं हो पाएगी और वहां नई मूर्ति स्थापित करनी पड़ेगी। परिषद का कहना है कि कोई भी भक्त यह कभी नहीं चाहेगा कि सदियों पुरानी जागृत मूल मूर्ति को बदला जाए।
जनमानस की अटूट आस्था को पहुंच सकता है आघात:
सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से मंदिर केवल एक भौतिक ढांचा नहीं, बल्कि अटूट विश्वास का केंद्र है। यदि मूल विग्रह को वहां से हटाया या बदला जाता है, तो आम श्रद्धालुओं में यह संदेश जाएगा कि मूल शक्ति अब वहां नहीं है। इससे सदियों पुराना विश्वास कमजोर हो सकता है और भक्तों की भावनाओं को गहरा ठेस पहुंच सकता है।
ब्राह्मण विकास परिषद का सर्वोत्तम विकल्प और सुझाव
इन सभी शास्त्रीय संघर्षों, कर्मकांडीय जटिलताओं और जनभावनाओं को देखते हुए परिषद के अध्यक्ष ऋषिकेश पांडेय ने एक सर्वोत्तम मार्ग सुझाया है:
भगवती की मूल मूर्ति को बिना स्पर्श किए, उनके वर्तमान स्थान पर ही सुरक्षित रखा जाए।
चारों तरफ हो भव्य निर्माण: मूर्ति को केंद्र में रखकर, उसके बाहरी हिस्से और चारों तरफ एक भव्य, सुंदर और विशाल मंदिर का ढांचा निर्मित किया जाए।
मूल विग्रह की दिव्यता और पौराणिक मान्यता पूरी तरह अक्षुण्ण रहेगी।
श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास को कोई ठेस नहीं पहुंचेगी।
विस्थापन और पुनर्प्रतिष्ठा जैसी अत्यंत कठिन, जटिल और जोखिम भरी धार्मिक प्रक्रियाओं से मुक्ति मिलेगी।
ब्राह्मण विकास परिषद ने सभी सनातन प्रेमियों और श्रद्धालुओं से निवेदन किया है कि माता जी की मर्यादा और सनातन परंपराओं की रक्षा हेतु इस विचार का समर्थन करें, ताकि आस्था और मंदिर की भव्यता दोनों सुरक्षित रहें। भगवती की कृपा सब पर बनी रहे।
























































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