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नौशेरा के शेर' ब्रिगेडियर उस्मान की 78वीं पुण्यतिथि पर हुई रश्म अदायगी। आजादी के बाद भी न स्मारक बना न लगी मूर्ति

ब्रिगेडियर मो उस्मान के गांव बीबीपुर जाने के लिए बनी सड़क गड्ढों में तब्दील है।
श्रद्धाजंलि कार्यक्रम में सांसद, विधायक आने पर वादे तो बहुत किए, परंतु जाते ही भूल गए।
संवाददाता 
 घोसी।मऊ। घोसी ब्लाक के बीबीपुर में जन्म लेकर तीन जुलाई को भारत पाक सीमा पर देश के लिए नौशेरा के पास पाकिस्तानी आक्रमण में शहीद होने वाले शहीद ब्रिगेडियर उस्मान का जहां नौशेरा में स्मारक है, और वहां हर वर्ष कार्यक्रम होते हैं। परन्तु नौशेरा के शेर के नाम से मशहूर ब्रिगेडियर उस्मान के गांव के साथ घोसी स्थित तहसील मुख्यालय पर कोई भी स्मारक या मूर्ति स्थापित नहीं है। आज स्थिति यह है कि आज के युवा वर्ग के स्मृति से ब्रिगेडियर उस्मान विस्मृत होते जा रहे हैं। हालत यह है की घोसी मधुबन मार्ग से बीबीपुर गाँव को जाने वाली सड़क गड्ढों में तब्दील है।
उनके पैतृक गांव बीबीपुर में बृहस्पतिवार को एक श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें सपा से गाज़ीपुर के सांसद अफजाल अंसारी, आज़मगढ़ के सांसद धर्मेंद्र यादव, मऊ के विधायक अब्बास अंसारी आदि ने उनके प्रति अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित किया। वह कार्यक्रम कहने को तो सर्वदलीय था। लेकिन वह एक दल विशेष का कार्यक्रम बन कर रह जाने से सभी का कार्यक्रम नहीं बन सका। गांव के प्रधान प्रतिनिधि मुन्ना गुप्ता ने बताया कि गांव की सड़क, स्ट्रीट लाइट के साथ हवेली को संरक्षण देने के लिए पत्रक भी दिया लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई।
अमर शहीद एवं नौशेरा के शेर ब्रिगेडिय मो उस्मान का जन्म बीबीपुर गाँव स्थित एक नामी परिवार में हुआ था। इनके पिता जी आजादी से पूर्व काशी में कोतवाल थे। इनके नाना आजादी से पूर्व कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जी इनके ननिहाल पक्ष से है।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी बीबीपुर गाँव में इनके नाम पर न कोई स्मारक बन पाया और न ही घोसी तहसील मुख्यालय पर इनकी प्रतिमा स्थापित हुई। और न ही कोई शैक्षणिक संस्था ही स्थापित हुई। सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि बीबीपुर में कभी अपनी शानो शौकत के लिए मशहूर इनकी पैतृक हवेली जिसे आसपास में कोतवाल साहब की हवेली के रूप में जाना जाता था, वह पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो कर रह गई है। हवेली में रखे इनके बचपन से जुड़ी यादो के रूप में आरामकुर्सी, पलंग, मेज, शानदार दरवाजे, दस्तरखान,कीमती वर्तन आदि धीरे धीरे गायब हो गए। कुछ अपने लेते गए बाकी गैर ले गए। आज स्थिति यह है कि पूरी हवेली खंडहर बन कर रह गई है। गांव में परिवार की कुछ भूमि को छोड़ कर और तहसील मुख्यालय पर स्थित भूमि अब दूसरों की हो गई है। आज स्थिति यह है की गांव के साथ आसपास के युवा नौशेरा के शेर ब्रिगेडियर मो उस्मान को भूल गए हैं। कुछ बुजुर्गों को ही वे अभी भी याद है। लोगों के अनुसार जब तक इनके छोटे भाई ब्रिगेडिया मो गुफरान जिंदा थे और यहाँ आते रहते थे, तब तक यह हवेली गुलज़ार रही।
यह कैसी विडंबना है कि देश के लिए शहीद होने वाले ब्रिगेडियर मो उस्मान की आजादी के 78वर्ष बाद भी और जिसके परिवार के साथ रिश्तेदार बड़े ओहदेदार रहे हो उनका कोई स्मारक या प्रतिमा गांव के साथ तहसील या जिला मुख्यालय पर स्थापित नहीं है। नौशेरा के शेर ब्रिगेडियर मो उस्मान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि उनके पैतृक हवेली को स्मारक घोषित करने के साथ घोसी तहसील मुख्यालय पर या रेलवे स्टेशन पर उनकी आदमकद प्रतिमा की स्थापना हो।


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