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कृष्ण सुदामा मिलन की कथा सुन भावुक हुए श्रद्धालु

देवरिया।स्थानीय बरहज नगर में दुर्गा मंदिर के समीप सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा विश्राम दिवस पर अवध धाम से पधारे हुए भागवत कथा व्यास रमाशंकर शास्त्री  ने कृष्ण सुदामा मिलन की कथा का श्रद्धालुओं को रसपान कराते हुए कहां की जो गुण सुदामा के अंदर है वह भगवान से काम नहीं है जिस अवस्था में सुदामा जी हैं उनसे एक शिक्षा हम सभी को लेनी चाहिए सुदामा जी जितेंद्रिय सत्यवादी थे सुदामा अ याचक थे वह किसी के घर से कुछ मांगते नहीं थे घर वह बंद दोनों तपस्वी के लिए बराबर है सुदामा जी  गृहस्त आश्रम में रहते हुए अपने निर्णय पर अधिक रहते थे एक दिन उनकी धर्मपत्नी सुशील ने कहा की सुना है कि श्री कृष्णा आपका मित्र हैं एक बार उनसे जाकर मिलते तो शायद गरीबी दूर हो जाती तब सुदामा ने कहा कि भगवान के प्रति मेरे हृदय में इतना प्रेम है सुशील ने कहा कि आप एक बार जाइए कृष्ण दर्शन की सुशीला प्रेरणा स्रोत बनी सुदामा जी ने कहा कि सुशीला गुरु ब्राह्मण मित्र सगे संबंधियों के घर खाली हाथ नहीं जाना चाहिए प्रेम का बंधन भगवान जानते हैं मनुष्य नहीं जान पता सुशील ने पड़ोसी के घर से तीन मुट्ठी चावल मांग कर ले आई और फटे पुराने कपड़े में बांधकर दे दिया अब सुदामा जी अपने मित्र कृष्ण से मिलने चल दिए उधर भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि हमारा मित्र सुदामा आज मुझसे मिलने आ रहा है मार्ग में सुदामा जी थक गए और एक पेड़ के नीचे सो गए जब सो गए तो भगवान कृष्ण ने अपनी योग माया से सुदामा को द्वारिका तक ला दिया और जब सुदामा की नींद टूटी तो देखा कि मैं द्वारिका के बिल्कुल निकट हो उन्होंने द्वारपालो से अपने मित्र कृष्ण के बारे में पूछा द्वारपालों ने कहा आप कहां से आए हैं उन्होंने कहा कि बचपन का मेरा मित्र कृष्ण है उसी से मिलने आया हूं इसकी सूचना जैसे ही कृष्ण को मिली और उन्होंने सुना कि मेरा मित्र सुदामा मिलने आया है भगवान राज सिंहासन छोड़कर सुदामा से मिलने के लिए दौड़ पड़े और सुदामा को अपने गले से लगा लिया तथा राजमहल में ले जाकर अपने राज सिंहासन पर बैठकर सुदामा की दीन दशा देखकर करुणा निधान इतना रोए की सुदामा के चरण भगवान की आंसुओं से धुल गया। 
देख सुदामा की दीन दशा करुणा करके करुणानिधि रोए पानी परात को हाथ छूयो नहीं नैनन के जल से पग धोए।
फिर दोनों मित्रों में आपस की चर्चा चलने लगी इसी बीच भगवान कृष्ण की नजर सुदामा की कांख में दबी हुई पोटली पर पड़ी कृष्ण ने कहा मित्र यह क्या छुपाए हो और भगवान ने झट से सुदामा के कांख से पोटली निकाल ली और कहा कि मित्र भाभी के हाथ का चावल और मां यशोदा के हाथ का अगर दूध होता तो कितनी सुंदर खीर बनती यह करते हुए भगवान ने एक मुट्ठी चावल खा लिया और अपने मित्र सुदामा को एक लोक दे दिया दूसरी मुट्ठी भी खाई और दूसरा लोक भी दे दिया तीसरी मुट्ठी अभी खाने ही वाले थे तब तक कमला ने भगवान का हाथ पकड़ लिया कहां प्रभु यह आप क्या कर रहे हैं तीनों लोग आप ब्राह्मण को दे देंगे तो हम लोग कहां रहेंगे जिस पर भगवान रूस्ट हो गए और कहां कि मैं तो चावल का आनंद ले रहा था तुमने यह क्या कर दिया मैं अपने मित्र को तीसरा लोक भी दे देता तो अपने लिए एक नए लोग का निर्माण कर लेता। 
जेहिं मित्र दुख हो ही दुखारी।
तीनहीं विलोकत पातक भारी।।
सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र के दुख में उसका सहयोग करें।
कथा के मुख्य यजमान राजेंद्र प्रसाद जायसवाल पत्नी आरती जयसवाल ने वैदिक मंत्रों के बीच श्रीमद्भागवत जी का पूजन किया ।ततपश्चात कथा प्रारंभ हुई कथा के दौरान गोपाल जी जायसवाल, राजेश जायसवाल, प्रेमचंद जयसवाल ,,बजरंगी, तारकेश्वर , रामकेश्वर , गिरजेश , उमंग , मुकेश अनिल  ,अमर, विजय कुमार ,आनंद कुमार , सहित नगर के अन्य श्रद्धालु भक्तजन काफी संख्या में उपस्थित रहे।


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