निःशुल्क अस्थमा जांच शिविर में 49 मरीजों की हुई जांच
•धूल-धुएं और एलर्जी से बचाव जरूरी, इन्हेलर को लेकर भ्रांतियां दूर करें : डॉ. डी.डी. सिंह
सठियांव, आजमगढ़। आर.के. आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज, सठियांव की ओर से निःशुल्क अस्थमा जांच शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में कुल 49 मरीजों की स्पाइरोमेट्री और पीक फ्लोमीटर के माध्यम से जांच की गई। मरीजों को अस्थमा के लक्षण, बचाव और उपचार के संबंध में चिकित्सकों ने महत्वपूर्ण जानकारी दी।
इस अवसर पर बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. डी.डी. सिंह ने बताया कि अस्थमा श्वसन तंत्र से संबंधित बीमारी है, जिसकी शुरुआत कई मामलों में एलर्जी से होती है। एलर्जी के कारण श्वांस नली में सूजन आ जाती है, जिससे सांस लेने में परेशानी होने लगती है।
उन्होंने बताया कि चलने पर सांस फूलना, पूरा वाक्य न बोल पाना, बार-बार छींक आना, सोते समय घरघराहट या सीटी जैसी आवाज आना और बार-बार सर्दी-जुकाम होना अस्थमा के प्रमुख लक्षणों में शामिल हो सकते हैं। गंभीर स्थिति में मरीज बेहोशी जैसी स्थिति में भी पहुंच सकता है।
‘दमा दम से जाता है’ भ्रांति से बचें
डॉ. सिंह ने अस्थमा को लेकर प्रचलित भ्रांतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह धारणा गलत है कि ‘दमा दम से जाता है।’ चिकित्सकीय सलाह के अनुसार सावधानी, नियमित उपचार और बचाव के उपाय अपनाकर मरीज अस्थमा के हमलों को काफी हद तक नियंत्रित कर सकता है।
उन्होंने बताया कि अस्थमा के मरीजों के लिए इन्हेलर और नेबुलाइजर उपचार में उपयोगी होते हैं। इन्हेलर के माध्यम से दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है, जिससे जरूरत के समय तेजी से राहत मिल सकती है। उन्होंने कहा कि इन्हेलर को लेकर यह भ्रांति भी है कि इसके इस्तेमाल से मरीज को इसकी आदत पड़ जाती है या गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं। चिकित्सकीय सलाह के अनुसार इस्तेमाल किए जाने पर इन्हेलर की दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है और इसकी खुराक बहुत कम मात्रा में होती है।
बच्चों में भी अस्थमा के मामले
डॉ. डी.डी. सिंह ने बताया कि अस्थमा बच्चों और वयस्कों दोनों को प्रभावित कर सकता है। उनके अनुसार 20 बच्चों में लगभग एक तथा 30 वयस्कों में लगभग एक व्यक्ति इस बीमारी से प्रभावित हो सकता है। उन्होंने बताया कि बच्चों में अस्थमा के कई मामले कम उम्र में ही शुरू हो जाते हैं।
धूल और धुएं से रहें दूर
अस्थमा से बचाव के संबंध में उन्होंने कहा कि मरीजों को धूल, धुएं और एलर्जी पैदा करने वाले कारकों से बचना चाहिए। फूलों के पराग से दूरी बनाए रखने, घर में सीलन न होने देने और सोफा, तकिया, चादर आदि की नियमित सफाई करने की सलाह दी।
उन्होंने खान-पान और दिनचर्या में सावधानी बरतने की बात कहते हुए तली-भुनी, अत्यधिक मसालेदार तथा बाहरी खाद्य सामग्री से बचने की सलाह दी। साथ ही व्यक्तिगत और घरेलू स्वच्छता बनाए रखने पर जोर दिया।
शिविर में मरीजों की जांच विमल श्रीवास्तव ने तन्मयता से की।
इस अवसर पर संस्था के चेयरमैन डॉ. प्रेम प्रकाश यादव, प्राचार्य डॉ. केदारनाथ यादव, प्रशासनिक अधिकारी डॉ. प्रभात द्विवेदी, डॉ. प्रेम प्रकाश राय, डॉ. अजय कुमार सिंह, डॉ. अमित कुमार, डॉ. अखिलेश शुक्ला, डॉ. अभिषेक यादव, डॉ. नमिषा दास जायसवाल, डॉ. अजय यादव, डॉ. राहुल पाण्डेय, डॉ. सौरभ यादव, रश्मि मिश्रा सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
विशेषज्ञों ने मरीजों से अपील की कि सांस संबंधी लक्षणों को नजरअंदाज न करें और उचित जांच व चिकित्सकीय सलाह लेकर ही उपचार करें।



















































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