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सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्मोत्सव पर विशेष पराक्रम और विजय गाथा

विशेष समाचार।चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म की सही तारीख को लेकर इतिहासकारों में एकमत नहीं है, क्योंकि उस समय की तिथि-संरचना या रिकॉर्ड आज की तरह स्पष्ट नहीं थी। परंतु अधिकांश ऐतिहासिक स्रोतों और विद्वानों के अनुसार उनका जन्म लगभग 340 ईसा पूर्व से 345 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है।

स्थान: पिप्पलिवन (वर्तमान में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र के आस-पास)

21 अप्रैल को उनके जन्मदिवस के रूप में मनाया जाना एक आधुनिक सांस्कृतिक परंपरा या श्रद्धांजलि स्वरूप तय की गई तिथि हो सकती है, जिसका उद्देश्य उनकी ऐतिहासिक उपलब्धियों को याद करना है।

भारत के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखने वाले चन्द्रगुप्त मौर्य न केवल पहले मौर्य सम्राट थे, बल्कि उन्होंने एक विशाल और सशक्त साम्राज्य की नींव रखी थी जो मगध से लेकर अफगानिस्तान तक फैला हुआ था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म लगभग 340 ईसा पूर्व हुआ था। एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाले चन्द्रगुप्त ने आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) के मार्गदर्शन में नंद वंश का अंत कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। उनका शासनकाल न्याय, प्रशासन और सैन्य शक्ति के लिए जाना जाता है। उन्होंने ग्रीक आक्रमणों का साहसपूर्वक सामना किया और सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर को पराजित क साम्राज्य में शामिल किया।
चन्द्रगुप्त मौर्य, मौर्य साम्राज्य के संस्थापक और भारत के इतिहास में एक महान सम्राट के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका जन्म लगभग 345 ईसा पूर्व में पिप्पलिवन गणराज्य (वर्तमान गोरखपुर क्षेत्र, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। 

प्रारंभिक जीवन और चाणक्य से भेंट

चन्द्रगुप्त का प्रारंभिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। उनकी भेंट आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) से हुई, जिन्होंने उन्हें शिक्षा दी और नंद वंश के खिलाफ विद्रोह के लिए प्रेरित किया। चाणक्य की रणनीति और चन्द्रगुप्त की वीरता के परिणामस्वरूप, उन्होंने नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को पराजित कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।

मौर्य साम्राज्य की स्थापना और विस्तार

चन्द्रगुप्त ने लगभग 322 ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। उनका साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश से दक्षिण में कर्नाटक, पूर्व में बंगाल से पश्चिम में सौराष्ट्र तक फैला हुआ था। उ सुदृढ़ किया और विभिन्न सनिक व्यवस्था को राज्यपाल नियुक्त
किए।

विदेशी आक्रमणों का प्रतिरोध

सिकंदर महान की मृत्यु के बाद, चन्द्रगुप्त ने ग्रीक शासकों के खिलाफ अभियान चलाया और उन्हें पराजित किया। उन्होंने सेल्यूकस निकेटर से संधि की, जिसके तहत उन्हें पश्चिमोत्तर भारत के कुछ क्षेत्र प्राप्त हुए और एक सेल्यूकस की पुत्री से विवाह किया।
धर्म परिवर्तन और अंतिम दिन

अपने जीवन के अंतिम चरण में, चन्द्रगुप्त ने जैन धर्म अपनाया और आचार्य भद्रबाहु के साथ कर्नाटक के श्रवणबेलगोला चले गए। वहां उन्होंने कठोर तपस्या की और 298 ईसा पूर्व में समाधि ली। 
चन्द्रगुप्त मौर्य की शासन प्रणाली, सैन्य संगठन और प्रशासनिक दक्षता ने भारत के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा। उनकी नीतियों और उपलब्धियों ने उनके पोते अशोक महान के शासनकाल की नींव रखी।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने 305-303 ईसा पूर्व के दौरान सेल्यूकस निकेटर को हिंदुकुश पर्वत क्षेत्र में रोक दिया था। यह संघर्ष मौर्य और सेल्यूकस साम्राज्यों के बीच हुआ था, जब सेल्यूकस ने भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों पर पुनः नियंत्रण पाने का प्रयास किया।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

सिकंदर महान की मृत्यु के बाद, उनके सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने पूर्वी क्षेत्रों में अपना साम्राज्य स्थापित किया। 305 ईसा पूर्व में, उन्होंने सिंधु नदी पार कर उन क्षेत्रों पर आक्रमण किया जो पहले मैसेडोनियन साम्राज्य के अधीन थे और अब चन्द्रगुप्त मौर्य के नियंत्रण में थे। हालांकि, चन्द्रगुप्त की सेना ने उन्हें प्रभावी रूप से रोक दिया और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर किया।

संधि और परिणाम

इस संघर्ष के परिणामस्वरूप, दोनों शासकों के बीच एक संधि हुई। सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त को गंधार, पारोपमिसादे, और अराकोसिया जैसे क्षेत्र सौंपे, जो वर्तमान में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हिस्से हैं। इसके बदले में, चन्द्रगुप्त हाथी प्रदान किए, जो ब एकस को 500 युद्ध 1 ईसा पूर्व में इप्सस की लडाई में निर्णायक साबित हुए।

इस संधि ने भारत और यूनानी दुनिया के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों की नींव रखी। सेल्यूकस ने अपने राजदूत मेगस्थनीज को चन्द्रगुप्त के दरबार में भेजा, जिन्होंने मौर्य साम्राज्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी पश्चिमी दुनिया को प्रदान की।


इस प्रकार, चन्द्रगुप्त मौर्य ने न केवल सेल्यूकस को हिंदुकुश पर रोका, बल्कि एक मजबूत और विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की, जो भारतीय उपमहाद्वीप में मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष का प्रतीक बना।


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