Religion and Culture / धर्म और संस्कार

जीयुतपुत्रिका व्रत संपन्न करने के कठोर तप से गुजरती है माताएं

 

बिलरियागंज/आजमगढ़।स्थानीय कस्बा बिलरियागंज व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में रविवार को महिलाओं ने परंपरागत आस्था और श्रद्धा के साथ जीयुतपुत्रिका व्रत संपन्न करने के कठोर तप शुरू। यह व्रत मुख्यतः माताएं अपने पुत्र की दीर्घायु और जीवन में समृद्धि की कामना के लिए करती हैं।

सुबह से ही महिलाओं ने स्नान-ध्यान कर निर्जल व्रत का संकल्प लिया और दिनभर भूखी-प्यासी रहकर भगवान की पूजा-अर्चना की। देर शाम पारंपरिक विधान के अनुसार व्रत कथा का श्रवण शुरू किया, जिसमें व्रत की पौराणिक महत्ता और कथा सुनाई जाएगी। उसके बाद रात्रि में व्रत का पारण कर माताओं ने अपने संकल्प को पूर्ण करेंगी।

प्राचीन मान्यता
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि जीयुतपुत्रिका व्रत की परंपरा पौराणिक काल से चली आ रही है। मान्यता है कि यह व्रत सबसे पहले माता कुंती ने अपने पुत्रों के लिए किया था, वहीं दूसरी कथा में इसका संबंध माता जीवित्पुत्रिका से बताया गया है, जिन्होंने अपनी कठोर तपस्या और व्रत के प्रभाव से अपने पुत्र को यमराज से वापस पाया था। तभी से यह व्रत पुत्र की दीर्घायु और सुरक्षा हेतु माताओं द्वारा श्रद्धापूर्वक किया जाने लगा।

सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू
गांव और कस्बों में इस व्रत का सामूहिक स्वरूप देखने को मिला। महिलाएं मंदिरों और घरों में एकत्र होकर गीत-भजन गाती रहीं। बुजुर्ग महिलाओं ने नई पीढ़ी की बहुओं-बेटियों को व्रत की कथा सुनाती और उसकी महत्ता बताती है। इस व्रत से न केवल धार्मिक आस्था प्रकट होती है बल्कि सामाजिक एकजुटता भी मजबूत होती है।

विश्वास और आस्था
महिलाओं का विश्वास है कि यह व्रत करने से संतान को लंबी उम्र, निरोगी काया और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। साथ ही परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसलिए यह व्रत ग्रामीण अंचलों में विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ हर साल मनाया जाता है।

 


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