Latest News / ताज़ातरीन खबरें

वाराणसी में तैयार हुए दो डॉल्फिन प्वाइंट; देशी-विदेशी मेहमानों के बीच डॉल्फिन सफारी का क्रेज

वाराणसी में शहर से 35 किलोमीटर दूर ढकवा और कैथी दो जगह को डॉल्फिन सेंटर तैयार किए गए हैं.

वाराणसी में तैयार हुए दो डॉल्फिन प्वाइंट.

वाराणसी में तैयार हुए दो डॉल्फिन प्वाइंट।

वाराणसी:मंदिर, घाट और ऐतिहासिक धरोहरों के शहर काशी में दो डॉल्फिन प्वाइंट तैयार हुए हैं. यहां देश-विदेश के लोग डॉल्फिन की अठखेलियां देखने पहुंचते हैं. इनका ख्याल महिलाएं रखती हैं, जिन्हें डॉल्फिन मां के नाम से जाना जाता है. इनकी देखरेख में समय के साथ यहां बढ़ती डॉल्फिन की संख्या लोगों के लिए और भी ज्यादा रोमांचक माहौल बनाती है. यहां लोग नावों में सवार होकर डॉल्फिन के बीच पहुंचते हैं.

बता दें कि वाराणसी में शहर से 35 किलोमीटर दूर ढकवा और कैथी दो जगह को डॉल्फिन सेंटर तैयार किए गए हैं।वहां पर सैकड़ो की संख्या में डॉल्फिन मौजूद हैं. अब यह विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. इस प्वाइंट को अब अंतरराष्ट्रीय सर्किट के रूप में भी डेवलप किया जाएगा

ढाकवा की डॉल्फिन सफारी:वन पर्यवेक्षक रवि कुमार ने बताया कि वर्तमान गणना के अनुसार कानपुर बैराज से चुनार तक पूरे भारतवर्ष में सर्वाधिक डाल्फिन की संख्या पाई गई है, इससे उत्साहित होकर हम लोगों ने डॉल्फिन के लिए दो केंद्रों को तैयार किया है।

इसमें वाराणसी के ढकवा और गाजीपुर बॉर्डर के पास कैथी विलेज में डॉल्फिन केंद्र तैयार किए गए हैं. जहां आम जनमानस को उसकी जानकारी देने का भी प्रयास कर रहे हैं. वर्तमान में ढकवा गांव में यदि पर्यटक जाते हैं।

पर्यटक यहां भ्रमण करते हैं, तो डॉल्फिन प्वाइंट पर जाकर के डॉल्फिन को नदी के अंदर छलांग लगाते हुए देख सकते हैं. इसके साथ ही विभिन्न स्कूलों के बच्चे, नागरिक, टूरिस्ट को ले जाकर भी जागरूकता बढ़ाई जा रही है. लोग भी इसको लेकर बेहद उत्साहित हैं।

कुछ वर्षों में बढ़ी डॉल्फिन की संख्या: उन्होंने बताया कि वर्तमान जनगणना के अनुसार, कुल 600 प्लस डॉल्फिन की संभावना है. इसे वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के जरिए 2024 की जनगणना को 2025 में जारी किया गया है।

उसी को हम लोग आधार मानते हुए इसका संरक्षण कर रहे हैं. इसी के क्रम में हम लोगों ने डॉल्फिन मित्रों को यहां पर तैनात किया है, जो लगातार नदी में और नदी के आसपास इलाके में जाकर के शिक्षा और अवेयरनेस के माध्यम से डॉल्फिन के बारे में जागरूक कर रहे हैं।

इसके साथ ही नमामि गंगे परियोजना भवन विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा भी लगातार प्रयास किया जा रहे हैं कि डॉल्फिन की सुरक्षा के लिए पेट्रोलिंग व अन्य इंतजाम करना शामिल है

देशी-विदेशी मेहमानों के बीच डॉल्फिन सफारी का क्रेज.

डॉल्फिन मां के जरिए हो रहा संरक्षण: डॉल्फिन के संरक्षण के लिए डॉल्फिन मित्रों को तैनात किया गया है. यह डॉल्फिन मित्र महिलाएं हैं, जो इनका ख्याल रखती हैं. इन महिलाओं में से एक प्रीति निषाद हैं, जो हर दिन यहां आकर की सुबह से शाम तक डॉल्फिन के दिनचर्या को देखती हैं और गांव जाकर लोगों को जागरूक करती हैं कि वह यह गंगा में किसी तरीके का कचरा न करें. दूर से डॉल्फिन को देखें.

प्रीति बताती हैं कि समय के साथ अब लोगों में डॉल्फिन को लेकर के बड़ी जागरूकता है. यहां हम लोग कैंप के माध्यम से किताबों के माध्यम से अलग-अलग तरीके से कैंपेनिंग करके स्कूलों में जाकर के गांव में जाकर की बच्चों को, गांव वालों को डॉल्फिन के बारे में बताते हैं.

यह भी बताते हैं कि कैसे उन्हें सुरक्षित रखा जाए. नाविकों के साथ भी हम प्रशिक्षण कार्यक्रम करते हैं. हम उन्हें बताते हैं कि उन्हें गंगा नदी में बड़ा जाल नहीं फेंकना है और यदि उनके जाल में कोई डॉल्फिन फंस जाती है, तो तुरंत इसकी सूचना उन्हें वन विभाग को देनी है.

अपने साथ उनको चाकू और कैंची रखना है. जैसे हीं डॉल्फिन फंसे तुरंत जाल काटकर उन्हें गंगा में प्रवाहित करना है. हम नाविकों को यह भी बताते हैं कि किस तरीके से डॉल्फिन को बिना परेशान किए गंगा में नौका विहार कराना है, जिससे उनका रोजगार भी बना रहे और डॉल्फिन भी सुरक्षित रहे.

ढाकवा क्यों है डाल्फिन की फेवरेट: यह क्षेत्र डॉल्फिन के लिए अनुकूल क्यों है? इस बात को लेकर डॉल्फिन मित्र प्रीति कहती हैं कि वाराणसी का ढकवा और कैथी इलाका गंगा डॉल्फिन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह प्रकृति के साथ रहने और बात करने वाली जीव है.

यह पानी के बाहर ही निकालकर के सांस लेते हैं. ऐसे में इन्हें साफ स्थान की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. यह ऐसे हीं स्थान पर रहते हैं, जहां का पानी साफ और शांत वातावरण हो. उन्होंने बताया कि इस इलाके की तरफ बेहद शांत वातावरण होता है.

यहां पानी की गहराई बहुत ज्यादा है. चूंकि डॉल्फिन मछलियों का ही भोजन करती हैं और यहां पर छोटी मछलियों की बहुतायत संख्या है, जिससे उनका भोजन भी पूरा हो जाता है.

उन्होंने बताया कि यहां पर डॉल्फिनों के संरक्षित रहने में नविको का भी बड़ा योगदान है, क्योंकि वह स्टीमर नहीं बल्कि चप्पू नावों का प्रयोग करते हैं. डॉल्फिन को शोर से भी परेशानी नहीं होती और बहुत खुशी के साथ वह यहां पर सरवाइव कर रही है और दिन प्रतिदिन उनकी संख्या बढ़ती जा रही है.

150 से ज्यादा है डॉल्फिन की संख्या:वह बताती है कि पहले यहां पर्यटक बेहद कम आते थे, लेकिन वर्तमान समय में एक भी ऐसा दिन नहीं होता जब यहां पर्यटकों की संख्या न बढ़ती हो. हर दिन यहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं.

उन्होंने बताया कि डॉल्फिन की संख्या भी सितंबर-अक्टूबर से लेकर के फरवरी-मार्च तक सबसे ज्यादा रहती है. इस मौसम में हजारों की संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं.

कब करें डॉल्फिन सफारी:उन्होंने बताया कि डॉल्फिन को देखने के लिए सबसे उपयुक्त समय सितंबर-अक्टूबर से लेकर के फरवरी-मार्च तक का होता है, क्योंकि यह सर्दियों में सबसे ज्यादा दिखाई देती हैं और उसी समय इनके प्रजनन का समय होता है.

इस समय डॉल्फिन के छोटे बच्चे भी बहुतायत मात्रा में गंगा में अटखेलियां करते हुए नजर आ जाते हैं. वर्तमान समय में गंगा का जलस्तर बढ़ा हुआ है. बाढ़ की वजह से यह बेहद कम दिखाई दे रही है, लेकिन जैसे ही गंगा का जलस्तर सामान्य होगा, गंदगी हटेगी, उनकी संख्या फिर से वैसी ही हो जाएगी.

उन्होंने बताया कि समय के साथ वाराणसी में डॉल्फिन लगातार बढ़ रही हैं. अगर हम वर्तमान में इनकी संख्या देख तो लगभग 150 है जिसमें बड़े डॉल्फिन और छोटे बच्चे शामिल हैं.

लोगों को मिल रहा रोजगार:डॉल्फिन सफारी ने ढकवा और आसपास की गांव के लोगों को रोजगार भी दिया है. पहले जहां एक दो पर्यटक ही यहां आते थे, वहीं वर्तमान समय में सैकड़ो की संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं. इस वजह से स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिल रहा है और आर्थिक लाभ हो रहा है.

इसमें सबसे ज्यादा लाभ स्थानीय दुकानदारों और नविकों को हो रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले यहां कोई नहीं आता था. इस वजह से हमारे लिए रोजगार के ऑप्शन नहीं थे, लेकिन वर्तमान समय में हम दुकान संचालित करते हैं.

उन्होंने बताया कि यहां पर एक प्राचीन मंदिर भी है. जो भी पर्यटक यहां आते हैं. प्राचीन मंदिर की वजह से उसका दर्शन करते हैं और इसके साथ ही डॉल्फिन प्वाइंट से डॉल्फिन देखते हैं और हमारी बिक्री होती है.

हमारे रोजगार के लिए यह बहुत अच्छा जरिया है. यहां एक बार आने वाला व्यक्ति यहां से जाकर अपने साथ अन्य व्यक्तियों को जोड़ता है, जिससे यहां लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

पर्यटकों में गजब का उत्साह: वहीं, डॉल्फिन की सवारी करने वाले देशी-विदेशी मेहमान अपने अनुभव को लेकर के बेहद खुश हैं. ऑस्ट्रेलिया की रहने वाली विदेशी पर्यटक बताती हैं कि उन्होंने गूगल पर यहां के डॉल्फिन सफारी के बारे में सुना था. जब वह पहली बार आईं तो उन्हें अदभुत अनुभव हुआ.

इसके बाद वह दोबारा अपने ग्रुप के साथ आईं और मां गंगा की गोद में जाकर के बोट राइड के जरिए डॉल्फिन सफारी की. यह उनके जीवन का सबसे खूबसूरत अनुभव रहा. बेहद करीब से उन्हें गंगा डॉल्फिन को देखने को मिला और यहां पर उन्हें बड़ी संख्या में डॉल्फिन भी नजर आई.

अन्य सारे पर्यटक भी उसको लेकर के खुश हैं उनका कहना है कि वह अक्सर यहां आते हैं और अपने परिवार को लेकर के आते हैं. बच्चों को यहां डॉल्फिन देखना खूब पसंद आता है. वर्तमान समय में डॉल्फिन सफारी का आनंद स्कूली बच्चे सबसे ज्यादा लेते हैं.

पहले जहां वह दूसरे स्थान को अपना पिकनिक स्पॉट बनाते थे, वहीं वर्तमान समय में ढकवा डॉल्फिन प्वाइंट उनका पिकनिक स्पॉट बना हुआ है. बच्चे डॉल्फिन सफारी के फोटो-वीडियो भी खूब बनाते हैं.


Leave a comment

Educations

Sports

Entertainment

Lucknow

Azamgarh