संपादकीय | उपजातियों का इतिहास : विरासत, पहचान और विभाजन के बीच भारत की लंबी यात्रा
•अंग्रेजों से बहुत पहले मौजूद थीं सामाजिक जातीय पहचानें, लेकिन औपनिवेशिक जनगणना ने उन्हें नए प्रशासनिक और राजनीतिक रूप में ढाला
GGS NEWS 24।30 अगस्त 2026। संपादक चंद्रशेखर मौर्य की विशेष लेख
भारत में जाति और उपजाति का प्रश्न केवल वर्तमान राजनीति का विषय नहीं है। यह भारतीय समाज के हजारों वर्षों के सामाजिक इतिहास, पेशागत संरचनाओं, स्थानीय परंपराओं, विवाह संबंधों, सत्ता और औपनिवेशिक प्रशासन से जुड़ा हुआ विषय है। आज जब अलग-अलग समुदाय अपनी उपजातीय पहचान, अपने महापुरुषों और पूर्वजों की स्मृतियों को लेकर जागरूक हो रहे हैं, तब यह समझना जरूरी है कि उपजातियां कब और कैसे विकसित हुईं, अंग्रेजों की भूमिका क्या रही और इस पहचान के सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनों पक्ष क्या हैं।
इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन यह बताता है कि भारत की सभी जातियां और उपजातियां अंग्रेजों ने नहीं बनाई थीं। सामाजिक समूह, जातियां, बिरादरियां और पेशागत समुदाय ब्रिटिश शासन से सदियों पहले मौजूद थे। हालांकि ब्रिटिश शासन ने जनगणना, प्रशासनिक वर्गीकरण और सरकारी अभिलेखों के माध्यम से इन पहचानों को एक नए ढंग से दर्ज, वर्गीकृत और कई मामलों में अधिक स्थिर बनाया।
यही अंतर इतिहास और राजनीतिक दावे के बीच समझना जरूरी है।
प्राचीन भारत में सामाजिक समूहों की जटिल संरचना
भारतीय समाज में सामाजिक विभाजन की चर्चा प्राचीन वैदिक साहित्य में मिलती है। ऋग्वेद के पुरुष सूक्त (मंडल 10, सूक्त 90) में वर्णों का उल्लेख मिलता है। लेकिन आधुनिक अर्थ में हजारों जातियों और उपजातियों की जो जटिल व्यवस्था दिखाई देती है, उसे केवल इस एक वैदिक संदर्भ से समझना संभव नहीं है।
समय के साथ स्थानीय समुदायों, पेशागत समूहों, जनजातीय समूहों, धार्मिक परंपराओं और क्षेत्रीय समाजों ने अपनी अलग सामाजिक पहचानें विकसित कीं।
यही कारण है कि इतिहासकार भारतीय जाति व्यवस्था को एक स्थिर और एक जैसी व्यवस्था नहीं मानते।
मनुस्मृति और सामाजिक वर्गीकरण
लगभग ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ईस्वी दूसरी-तीसरी शताब्दी के बीच रचित मानी जाने वाली मनुस्मृति में वर्ण और सामाजिक कर्तव्यों से संबंधित विस्तृत नियम मिलते हैं।
लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी धर्मशास्त्रीय ग्रंथ में लिखे नियम और वास्तविक समाज में लोगों का जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहा होगा।
भारतीय इतिहास में स्थानीय समाजों की अपनी परंपराएं और व्यवस्थाएं भी थीं।
इसलिए यह कहना कि प्राचीन भारत में आज जैसी प्रत्येक जाति और उपजाति पहले से बिल्कुल उसी रूप में मौजूद थी, इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
मध्यकाल में बढ़ती सामाजिक विविधता
लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी के बीच भारत में अनेक क्षेत्रीय राजवंशों, व्यापारिक समूहों, कृषक समुदायों, सैनिक समूहों, शिल्पकारों और धार्मिक आंदोलनों का विस्तार हुआ।
भक्ति आंदोलन ने भी सामाजिक संरचना को प्रभावित किया। कबीर (लगभग 15वीं शताब्दी), रविदास (15वीं-16वीं शताब्दी), गुरु नानक (1469-1539) जैसे संतों की परंपराओं ने जन्म आधारित ऊंच-नीच पर सवाल खड़े किए।
इस काल में अनेक समुदायों की सामाजिक पहचानें बदलीं और नई सामुदायिक संरचनाएं विकसित हुईं।
अर्थात भारतीय समाज में सामाजिक पहचान हमेशा गतिशील रही।
अंग्रेजों के आने के बाद क्या बदला?
ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक विस्तार 18वीं शताब्दी में तेज हुआ और 1858 में भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के सीधे नियंत्रण में चला गया।
औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज को प्रशासन के लिए समझने और वर्गीकृत करने का प्रयास किया।
यहीं से जाति की पहचान को दर्ज करने की प्रक्रिया ने नया रूप लिया।
1871 : पहली अखिल भारतीय जनगणना की शुरुआत
1871-72 में ब्रिटिश भारतीय प्रशासन ने पहली व्यापक जनगणना प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद जनगणना नियमित प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनती गई।
लोगों की जाति, धर्म, भाषा, पेशा और अन्य सामाजिक पहचानें सरकारी आंकड़ों में दर्ज होने लगीं।
इससे एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया—
जो पहचानें पहले स्थानीय सामाजिक संबंधों और मौखिक परंपराओं में थीं, वे सरकारी कागजों और आंकड़ों का हिस्सा बनने लगीं।
1901 की जनगणना और हर्बर्ट रिस्ले
जाति के औपनिवेशिक वर्गीकरण की चर्चा में 1901 की जनगणना अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
ब्रिटिश अधिकारी और मानवशास्त्री हर्बर्ट होप रिस्ले (1851-1911) ने जाति और सामाजिक समूहों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया। उन्होंने जाति को तथाकथित नस्लीय और शारीरिक विशेषताओं से जोड़ने की कोशिश भी की।
आज रिस्ले की ऐसी कई धारणाओं को मानवविज्ञान और सामाजिक विज्ञान की दृष्टि से गंभीर आलोचना का सामना करना पड़ा है।
फिर भी उनकी जनगणना ने जातीय पहचान को सरकारी वर्गीकरण की एक महत्वपूर्ण इकाई बना दिया।
निकोलस डिर्क्स : अंग्रेजों ने जाति नहीं बनाई, लेकिन उसे नया रूप दिया
अमेरिकी इतिहासकार और मानवविज्ञानी निकोलस बी. डिर्क्स ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘Castes of Mind: Colonialism and the Making of Modern India’ (2001) में औपनिवेशिक शासन और जाति के संबंध का विस्तार से अध्ययन किया।
डिर्क्स का मूल तर्क यह नहीं था कि अंग्रेजों ने शून्य से जाति पैदा कर दी। उनका महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि औपनिवेशिक शासन ने जाति को भारतीय समाज को समझने और प्रशासन करने की एक प्रमुख श्रेणी बना दिया तथा उसके आधुनिक स्वरूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यानी—
जाति पुरानी थी, लेकिन औपनिवेशिक शासन ने उसके प्रशासनिक और राजनीतिक अर्थ को काफी बदल दिया।
1931 : अंतिम पूर्ण ब्रिटिश जाति जनगणना
1931 की जनगणना स्वतंत्रता से पहले भारत में जाति की व्यापक गणना का अंतिम प्रमुख उदाहरण बनी।
इसके बाद स्वतंत्र भारत में सामान्य जनगणना में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की गणना जारी रही, लेकिन सभी जातियों की व्यापक गणना नियमित जनगणना का हिस्सा नहीं रही।
इसीलिए 1931 के जातिगत आंकड़े आज भी सामाजिक और राजनीतिक चर्चाओं में बार-बार सामने आते हैं।
उपजाति का सकारात्मक पक्ष : अपनी जड़ों की तलाश
आज अनेक समुदाय अपने पूर्वजों का इतिहास खोज रहे हैं।
यह अपने आप में गलत नहीं है।
किसी समुदाय ने यदि शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दिया है, किसी ने सेना में, किसी ने कृषि में, किसी ने शिल्प में, किसी ने व्यापार में और किसी ने सामाजिक सुधार में—तो उस इतिहास को दर्ज किया जाना चाहिए।
पूर्वजों को याद करना सामाजिक स्मृति है।
अपने महापुरुषों की जयंती मनाना, उनकी जीवनी प्रकाशित करना, बच्चों को उनके संघर्षों के बारे में बताना और उनके नाम पर पुस्तकालय, छात्रावास, विद्यालय या सामाजिक संस्थाएं बनाना समाज को आगे ले जाने वाला काम हो सकता है।
समुदाय आधारित संगठन गरीब बच्चों की शिक्षा, रोजगार, सामूहिक विवाह, स्वास्थ्य शिविर और सामाजिक सहायता के माध्यम से भी सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन गौरव जब श्रेष्ठता बन जाए तो खतरा शुरू होता है
समस्या तब पैदा होती है जब इतिहास को आत्मसम्मान के बजाय दूसरों को नीचा दिखाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगे।
“हमारे पूर्वज महान थे”—यह गर्व की बात हो सकती है।
लेकिन—
“इसलिए हम दूसरों से श्रेष्ठ हैं”—यह सामाजिक विभाजन की शुरुआत है।
उपजातीय पहचान जब विवाह, सामाजिक मेल-जोल, राजनीति, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में कठोर दीवार बन जाती है, तब उसका नकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ता है।
आज सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। इतिहास के आधे-अधूरे प्रसंग, अप्रमाणित वंशावली और जातीय श्रेष्ठता के दावे कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाते हैं।
डॉ. आंबेडकर की चेतावनी
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 1936 में लिखे अपने प्रसिद्ध भाषण Annihilation of Caste में जाति व्यवस्था की कठोर आलोचना की।
उनका मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है। समाज में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व भी आवश्यक हैं।
अंतरजातीय विवाह को लेकर आंबेडकर ने जाति की दीवार तोड़ने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।
उनकी चिंता यह थी कि जन्म के आधार पर मनुष्य की सामाजिक स्थिति तय करने वाली व्यवस्था लोकतांत्रिक समाज के मूल सिद्धांतों से टकराती है।
एम.एन. श्रीनिवास और बदलती जाति
भारतीय समाजशास्त्री मैसूर नरसिम्हाचार श्रीनिवास (1916-1999) ने भारतीय जाति व्यवस्था को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनकी अवधारणा ‘Sanskritization’ बताती है कि सामाजिक समूह समय के साथ अपनी सामाजिक स्थिति और सांस्कृतिक पहचान को बदलने का प्रयास करते रहे।
उनकी दूसरी महत्वपूर्ण अवधारणा ‘Dominant Caste’ थी।
इससे यह समझने में मदद मिलती है कि जाति केवल धार्मिक या सामाजिक पहचान नहीं थी; कई क्षेत्रों में भूमि, संख्या, शिक्षा और राजनीतिक शक्ति भी किसी समुदाय की सामाजिक स्थिति को प्रभावित करती थी।
इस दृष्टि से देखा जाए तो उपजातियां भी स्थिर पत्थर की लकीर नहीं हैं। वे समय, स्थान और सामाजिक परिस्थितियों के साथ बदलती रही हैं।
1950 : संविधान ने दी नई दिशा
26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान को अपनाया गया और 26 जनवरी 1950 को यह लागू हुआ।
संविधान ने नागरिकों के लिए समानता का सिद्धांत स्थापित किया।
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है।
अनुच्छेद 15 धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, जबकि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति-जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान की संवैधानिक गुंजाइश भी रखता है।
इससे भारतीय समाज के सामने एक नई चुनौती और अवसर दोनों आए—
पहचान भी रहे और समानता भी कायम रहे।
1990 : मंडल के बाद जाति का नया राजनीतिक दौर
7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की।
इसके बाद भारत में पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व और आरक्षण को लेकर व्यापक राजनीतिक एवं सामाजिक बहस हुई।
1992 के इंद्रा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण के संवैधानिक ढांचे पर महत्वपूर्ण फैसला दिया।
इस दौर ने यह स्पष्ट किया कि जाति केवल सामाजिक पहचान नहीं है; यह प्रतिनिधित्व, अवसर और सत्ता से भी जुड़ी हुई है।
21वीं सदी : जाति से डिजिटल पहचान तक
21वीं सदी में जातीय संगठन पूरी तरह समाप्त नहीं हुए, बल्कि उनका स्वरूप बदल गया।
अब समुदाय सम्मेलन के साथ-साथ—
वेबसाइट, व्हाट्सऐप समूह, फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया अभियान के माध्यम से भी अपनी पहचान को मजबूत कर रहे हैं।
यह सकारात्मक भी हो सकता है, यदि इसका उद्देश्य शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सहायता और इतिहास संरक्षण हो।
लेकिन यही माध्यम जातीय नफरत, झूठे इतिहास और सामाजिक टकराव को भी बढ़ा सकते हैं।
इसलिए आज जरूरत इतिहास मिटाने की नहीं, बल्कि इतिहास को प्रमाण के साथ समझने की है।
दुनिया के इतिहासकारों से मिलने वाला सबसे बड़ा सबक
इतिहासकार ई.एच. कार (1892-1982) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक What Is History? में इतिहास और तथ्य के संबंध पर विचार करते हुए इतिहास को अतीत और इतिहासकार के बीच निरंतर संवाद के रूप में समझाया।
इस विचार का अर्थ यह है कि इतिहास केवल गौरवगाथा नहीं है।
इतिहास में उपलब्धियां भी होती हैं और गलतियां भी।
यदि हम केवल अपने पूर्वजों की उपलब्धियां लिखेंगे और उनकी कमियां छिपाएंगे, तो हम इतिहास नहीं, बल्कि महिमामंडन लिख रहे होंगे।
इसी प्रकार यदि हम केवल अपने समाज की कमियां बताएंगे और उसके योगदान को भूल जाएंगे, तो वह भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
उपजाति से ऊपर उठकर पूर्वजों का सम्मान
आज भारत के सामने रास्ता बिल्कुल स्पष्ट है।
हमें अपने पूर्वजों को भूलना नहीं है।
लेकिन उनकी स्मृति को सामाजिक संघर्ष का हथियार भी नहीं बनाना है।
अगर किसी समुदाय के पूर्वज महान थे तो उनकी महानता का सबसे अच्छा प्रमाण यह होगा कि आज उनकी संतानों द्वारा—
एक गरीब बच्चे को शिक्षा मिले,
एक बेरोजगार युवक को रोजगार मिले,
एक बीमार व्यक्ति की मदद हो,
एक बेटी को आगे बढ़ने का अवसर मिले,
एक गांव में पुस्तकालय बने,
और समाज में किसी कमजोर व्यक्ति के साथ भेदभाव न हो।
यही पूर्वजों के प्रति वास्तविक सम्मान होगा।
जड़ें अपनी हों, छांव सबकी हो
भारत में उपजातियों का इतिहास न तो केवल अंग्रेजों से शुरू होता है और न ही अंग्रेजों की भूमिका को पूरी तरह नकारा जा सकता है।
पूर्व-औपनिवेशिक भारत में सामाजिक समूह और जातीय पहचानें मौजूद थीं।
औपनिवेशिक शासन ने जनगणना, प्रशासन और वर्गीकरण के माध्यम से उन पहचानों को नए ढंग से व्यवस्थित और कई बार कठोर किया।
स्वतंत्र भारत ने संविधान के माध्यम से समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय का रास्ता चुना।
आज हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी जातीय और उपजातीय विरासत का अध्ययन करें, अपने पूर्वजों के संघर्ष को सम्मान दें और अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाएं।
लेकिन साथ ही यह भी याद रखें—
पहचान हमें अपनी जड़ों से जोड़ सकती है, लेकिन श्रेष्ठता की भावना हमें दूसरों से काट देती है।
भारत को ऐसी सामाजिक चेतना चाहिए जिसमें हर समुदाय अपने इतिहास पर गर्व कर सके, लेकिन किसी दूसरे समुदाय को छोटा न समझे।
अपनी जाति का इतिहास जानिए, अपने पूर्वजों को याद कीजिए, अपनी विरासत बचाइए—लेकिन भारतीय होने की साझा पहचान को सबसे ऊपर रखिए।






















































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