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ग्रन्थपरिक्रमा 28 कथा विशेष आचार्य बृजेश मणि त्रिपाठी।

देवरिया।शिवजी की कृपा से प्राप्त सुदर्शन चक्र से विष्णु भगवान ने शिवजी को तीन भागों में काट दिया?

 प्राचीन कालमें श्रीदामा नामसे विख्यात एक महान् असुरराज था। उसने सारे संसारको अपने अधीन करके लक्ष्मीको भी अपने वशमें कर लिया। उसके यश और प्रतापसे तीनों लोक श्रीहीन हो गये। उसका मन इतना बढ़ गया कि वह भगवान् विष्णुके श्रीवत्सको ही छीन लेनेकी योजना बनाने लगा। उस महाबलशाली असुरकी इस दूषित मनोभावनाको जानकर उसे मारनेकी इच्छासे भगवान् विष्णु महेश्वरके पास गये। उस समय योगमूर्ति महेश्वर हिमालयकी ऊँची चोटीपर योगमग्न थे। तब भगवान् विष्णु जगन्नाथके पास जाकर एक हजार वर्षतक पैरके अँगूठेपर खड़े रहकर परमब्रह्मकी उपासना करते रहे।

 

भगवान् विष्णुकी इस कठोर साधनासे प्रसन्न होकर भगवान् शिवने उन्हें सुदर्शनचक्र प्रदान किया। उन्होंने सुदर्शनचक्रको देते हुए भगवान् विष्णुसे कहा- 'देवेश! यह सुदर्शन नामका श्रेष्ठ आयुध बारह अरों, छः नाभियों एवं दो युगोंसे युक्त, तीव्र गतिशील और समस्त आयुधोंका नाश करनेवाला है। सज्जनोंकी रक्षा करनेके लिये इसके अरोंमें देवता, राशियाँ, ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति, हनुमान्, धन्वन्तरि, तप तथा चैत्रसे लेकर फाल्गुनतकके बारह महीने प्रतिष्ठित हैं। विभो ! आप इसे लेकर निर्भीक होकर शत्रुओंका संहार करें।'

 

शिवजीकी यह बात सुनकर भगवान् विष्णुने कहा- 'शम्भो ! मुझे यह कैसे मालूम होगा कि यह अस्त्र अमोघ है? विभो ! यदि यह अस्त्र आपको प्रभावित कर सके तो मैं इसे अमोघ और निरन्तर गतिशील मानूँगा। यदि आप आज्ञा दें तो इसकी परीक्षा करनेके लिये मैं इसका प्रयोग आपपर ही करूँ।

शिवजीने कहा- 'यदि आप ऐसा सोचते हैं तो आप निश्चिन्त होकर इसे मेरे ऊपर चलाइये और इसकी परीक्षा कर लीजिये।

भगवान् विष्णुने जब सुदर्शनचक्रका प्रयोग शिवजीपर किया तो अजर-अमर शिवजी भी तीन खण्डोंमें कट गये। इन तीन खण्डोंके नाम पड़े-विश्वेश, यज्ञेश तथा यज्ञयाजक। शिवजीको तीन खण्डोंमें कटा देखकर भगवान् विष्णु लज्जित हो गये और वे बार-बार सदाशिवको प्रणाम करने लगे। भगवान् विष्णुकी यह दशा देखकर सदाशिव बोले- 'महाबाहो ! चक्रकी नेमिद्वारा मेरा यह प्राकृत विकार ही काटा गया है। मैं और मेरा स्वभाव तो क्षत नहीं हुआ। यह तो सर्वथा अच्छेद्य तथा अदाह्य है ही। केशव ! आजसे मेरा एक अंश हिरण्याक्ष, दूसरा सुवर्णाक्ष और तीसरा विरूपाक्षके नामसे जाना जायगा। ये मेरे तीनों अंश आराधनासे महान् पुण्य प्रदान करनेवाले होंगे। विभो ! आप उठें और उस असुरका वध कर डालें।' तब भगवान् विष्णुने उस सुदर्शनचक्रसे असुर श्रीदामाको युद्धमें परास्त करके मार डाला।'

 

कालातीत सत्तासे उत्पन्न और प्राप्त सुदर्शन महाकालका एक प्रसाद-एक प्रतीक है, जो अत्यन्त गतिशील और अमोघ है। देवता, दानव और मनुष्य, चर और अचर सभीसे अधिक शक्तिमान् वह चक्र आपातदृष्टिसे देखनेपर सुन्दर है और वही भगवान् हरिका परम आयुध है।

 


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