वायरल होने की भूख में सामाजिक सौहार्द की नीलामी::: लाइक और व्यूज के लिए मर्यादा की बलि—सोशल मीडिया बना अभिव्यक्ति का मंच या विद्वेष की फैक्ट्री? प्रो अजय कुमार मिश्र --
देवरिया। बरहज ,कभी सोशल मीडिया को दुनिया को जोड़ने वाला माध्यम कहा गया था। अब लगता है कि कुछ लोगों ने इसे समाज को तोड़ने का शॉर्टकट समझ लिया है। जिस मोबाइल की स्क्रीन पर ज्ञान, सूचना और सकारात्मक संदेशों की दुनिया खुलनी चाहिए, उसी स्क्रीन पर कुछ मुट्ठी भर लोग झूठ, अश्लीलता, आपत्तिजनक टिप्पणियों और धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली सामग्री परोसकर ‘वायरल’ होने की ऐसी दौड़ में शामिल हैं, जिसमें मंजिल का नाम शायद लाइक, व्यूज और सस्ती लोकप्रियता है।
विडंबना यह है कि आजकल प्रसिद्ध होने के लिए प्रतिभा की जरूरत कम और विवाद पैदा करने की कला की जरूरत ज्यादा समझी जाने लगी है। कोई लोक आस्था से जुड़े देवी-देवताओं पर टिप्पणी कर देता है, कोई किसी वर्ग, जाति या सम्प्रदाय को निशाना बनाता है और कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति पर अभद्र या अश्लील टिप्पणी करके खुद को ‘सोशल मीडिया स्टार’ समझने लगता है। मानो मर्यादा अब पुरानी चीज हो गई हो और वायरल होना ही आधुनिक सफलता का प्रमाणपत्र।कुछ लोगों ने ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ को ‘फ्रीडम ऑफ इंसल्ट’ समझ लिया है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ यह कतई नहीं कि किसी की आस्था, प्रतिष्ठा या सामाजिक पहचान को जानबूझकर चोट पहुंचाई जाए। असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, अपमान नहीं।सबसे चिंताजनक तस्वीर नई उम्र के उन युवाओं की है, जो कुछ क्षण की डिजिटल प्रसिद्धि के लिए ऐसी फोटो, वीडियो और पोस्ट डाल देते हैं, जिनका असर स्क्रीन से बाहर निकलकर परिवार और समाज तक पहुंचता है। कैमरे के सामने कुछ सेकंड की हरकत और उसके बाद हजारों लोगों की प्रतिक्रिया—बस, ‘स्टार’ बनने का भ्रम पैदा हो जाता है। फिर वही सामग्री शेयर होती है, रीपोस्ट होती है और देखते ही देखते विवाद की आग में घी का काम करती है।
सोशल मीडिया का एल्गोरिदम भी कभी-कभी अजीब शिक्षक बन जाता है—जो सबसे ज्यादा शोर करता है, उसे सबसे आगे बैठा देता है।
नतीजा यह कि संयमित और सार्थक आवाजें पीछे छूट जाती हैं और उत्तेजक, विवादित तथा सनसनीखेज सामग्री चर्चा के केंद्र में आ जाती है।
यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत चरित्र या शिष्टाचार का सवाल नहीं है। जब जाति, धर्म, सम्प्रदाय अथवा किसी समुदाय को लेकर लगातार उकसाने वाली सामग्री प्रसारित होती है तो उसका सीधा असर सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। एक झूठी पोस्ट कई वर्षों से बने आपसी विश्वास को कुछ मिनटों में चोट पहुंचा सकती है। एक आपत्तिजनक टिप्पणी दो समुदायों के बीच अनावश्यक तनाव पैदा कर सकती है।जरूरत केवल पोस्ट हटाने या अकाउंट बंद करने की नहीं, बल्कि डिजिटल जिम्मेदारी की संस्कृति विकसित करने की है। प्लेटफॉर्मों को आपत्तिजनक सामग्री के विरुद्ध प्रभावी और त्वरित कार्रवाई करनी होगी। कानून लागू करने वाली एजेंसियों को भी ऐसे मामलों में निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही परिवार, विद्यालय और समाज को युवाओं को यह समझाना होगा कि इंटरनेट पर डाली गई सामग्री मजाक नहीं, एक सार्वजनिक जिम्मेदारी है।
क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि किस पोस्ट पर कितने लाइक मिले, सवाल यह है कि उस पोस्ट ने समाज को कितना जोड़ा या कितना तोड़ाI वायरल होने की होड़ में यदि विवेक ही ऑफलाइन हो गया, तो अगली पीढ़ी के हाथ में स्मार्टफोन तो होगा, लेकिन समाज के पास शायद भरोसा नहीं बचेगा।सवाल अब प्रशासन से भी है
लेकिन बात केवल सोशल मीडिया के शोहदों और सस्ती लोकप्रियता के भूखे लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की जवाबदेही का है। आपत्तिजनक पोस्ट, धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली टिप्पणियां और जाति-सम्प्रदाय के नाम पर जहर उगलने वाली सामग्री जब खुलेआम प्रसारित होती है, तो निगरानी तंत्र आखिर कहां रहता है? शिकायत के बाद कार्रवाई होती है या विवाद बढ़ने का इंतजार किया जाता है?
प्रशासन को यह तय करना होगा कि कानून सोशल मीडिया की स्क्रीन के बाहर ही नहीं, उसके भीतर भी उतनी ही मजबूती से लागू होता है। अफवाह, घृणा और जानबूझकर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों पर समय रहते संज्ञान लेकर निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है। कार्रवाई ऐसी हो कि न किसी निर्दोष की अभिव्यक्ति कुचली जाए और न किसी उपद्रवी को कानून की कमजोरी का भरोसा मिले।क्योंकि एक आपत्तिजनक पोस्ट केवल एक पोस्ट नहीं होती—वह कभी-कभी सामाजिक तनाव की चिंगारी बन सकती है। इसलिए प्रशासन की जिम्मेदारी केवल विवाद होने के बाद शांति व्यवस्था संभालना नहीं, बल्कि विवाद पैदा करने वाली डिजिटल गतिविधियों पर समय रहते प्रभावी नियंत्रण रखना भी है।
लाइक और व्यूज के लिए समाज की शांति दांव पर लगाने वालों को यह संदेश साफ मिलना चाहिए कि वायरल होने की आजादी है, लेकिन सामाजिक विद्वेष फैलाने की नहीं।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस डिजिटल अराजकता को केवल ‘सोशल मीडिया की शरारत’ मानकर टालता है या सामाजिक सौहार्द की रक्षा को अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी मानते हुए समय रहते कठोर, निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई करता है।





















































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