पौराणिक कथा ऋषि मृकण्डु की तपस्या और वरदान:मार्कण्डेय महादेव मंदिर
उत्तर प्रदेश के वाराणसी से लगभग 30 किलोमीटर दूर रजवाड़ी, स्थित कैथी गाँव में गंगा और गोमती नदी के पवित्र संगम पर श्री मार्कण्डेय महादेव मंदिर स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहाँ यमराज को भी शिवभक्त के आगे खाली हाथ लौटना पड़ा था और महामृत्युंजय स्वरूप की स्थापना हुई थी।
पौराणिक कथा
ऋषि मृकण्डु की तपस्या और वरदान
प्राचीन काल में ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी मरुद्वती संतानहीन थे। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। भोलेनाथ उनकी साधना से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने दो विकल्प दिए:
या तो दीर्घायु वाला परंतु गुणहीन पुत्र, या
मात्र 16 वर्ष (कुछ कथाओं में 12 वर्ष) की अल्पायु वाला अत्यंत ज्ञानी, धार्मिक और गुणवान पुत्र।
ऋषि मृकण्डु ने अल्पायु परंतु ज्ञानी पुत्र को चुना। समय आने पर उनके यहाँ एक दिव्य बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम मार्कण्डेय रखा गया।
महामृत्युंजय जाप और यमराज का आगमन
बालक मार्कण्डेय बचपन से ही अत्यंत शिवभक्त थे। जब मार्कण्डेय की आयु पूरी होने वाली थी, तब उनके माता-पिता दुःखी रहने लगे। सच्चाई जानने पर मार्कण्डेय ने तनिक भी भयभीत न होकर गंगा-गोमती संगम के तट पर जाकर बालू से शिवलिंग निर्मित किया और पार्थिव पूजन करते हुए भगवान शिव की घोर साधना शुरू कर दी।
जब नियत समय पर यमराज स्वयं मार्कण्डेय के प्राण हरने आए, तब बालक मार्कण्डेय भावविभोर होकर शिवलिंग को दोनों भुजाओं से कसकर लिपट गए और भोलेनाथ की रक्षा पुकारने लगे।
भगवान शिव का प्रकटीकरण और अमरता
जैसे ही यमराज ने अपने पाश से बालक को खींचना चाहा, क्रोधित होकर स्वयं देवाधिदेव महादेव शिवलिंग से प्रकट हो गए। भगवान शिव ने यमराज को रोकते हुए अपने भक्त की रक्षा की और यमराज को वहाँ से लौटना पड़ा।
शिवजी ने बालक मार्कण्डेय की अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अमरता का वरदान दिया और कहा कि उनकी आयु अब काल की गणना से परे होगी। इसी तपोभूमि पर मार्कण्डेय ऋषि ने मृत्यु पर विजय पाने के लिए प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया था।
मंदिर का धार्मिक व सांस्कृतिक महत्त्व
महामृत्युंजय सिद्धपीठ: यह स्थान अकाल मृत्यु के भय के निवारण, गंभीर रोगों से मुक्ति और दीर्घायु की कामना के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
संतान प्राप्ति का केंद्र: मान्यता है कि संतानहीन दंपत्ति यहाँ आकर शिवलिंग का दर्शन-पूजन करते हैं या 'हरिवंश पुराण' का पाठ करते हैं, तो उन्हें योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
श्रीराम अंकित बेलपत्र: इस मंदिर की विशेष परंपरा है कि यहाँ शिवलिंग पर चंदन से 'श्रीराम' लिखे बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं।
शैव-वैष्णव एकता का प्रतीक: इस तीर्थ को शैव (शिव मार्ग) और वैष्णव (विष्णु मार्ग) परंपराओं के मिलन का अद्वितीय प्रतीक माना जाता है।























































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