गुरु ही जीवन के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं: अवधेश कुमार मिश्रा
•सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, झारखंड में गुरु पूर्णिमा एवं महर्षि वेदव्यास जयंती पर हुआ भव्य आयोजन, विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति से जुड़ने का दिया संदेश
कादीपुर (सुल्तानपुर)। सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, झारखंड, कादीपुर में गुरु पूर्णिमा एवं महर्षि वेदव्यास जयंती का पर्व बुधवार को श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के वातावरण में मनाया गया। विद्यालय परिसर में आयोजित कार्यक्रम में गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा महर्षि वेदव्यास के अद्वितीय योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण का संकल्प लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ महर्षि वेदव्यास एवं माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार और वंदना ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया। विद्यालय परिसर गुरु वंदना और भारतीय संस्कृति के जयघोष से गूंज उठा।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ आचार्य श्री सत्येंद्र कुमार सिंह ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि महर्षि वेदव्यास भारतीय ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति और सनातन परंपरा के ऐसे महान ऋषि हैं, जिनका योगदान युगों-युगों तक मानव समाज का मार्गदर्शन करता रहेगा। उन्होंने कहा कि महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन एवं विभाजन कर ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। महाभारत, श्रीमद्भागवत सहित अनेक महान ग्रंथों की रचना कर उन्होंने भारतीय संस्कृति को अमूल्य धरोहर प्रदान की।
उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे महर्षि वेदव्यास के आदर्शों, तप, त्याग और ज्ञान साधना को अपने जीवन का आधार बनाएं। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवन में भी भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि वर्तमान समय में इनकी आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है।
विद्यालय के प्रधानाचार्य अवधेश कुमार मिश्रा ने गुरु पूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह शिष्य के जीवन का पथप्रदर्शक होता है। गुरु अपने ज्ञान, अनुभव और संस्कारों से शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है तथा उसे जीवन की सही दिशा प्रदान करता है।
उन्होंने संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे—
"जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं हम नाहिं।
प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥"
—का भावार्थ समझाते हुए कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार और 'मैं' की भावना बनी रहती है, तब तक वह गुरु के वास्तविक ज्ञान और कृपा का अधिकारी नहीं बन सकता। विनम्रता, समर्पण और श्रद्धा ही सच्चे ज्ञान की पहली सीढ़ी है। उन्होंने विद्यार्थियों से गुरुजनों के प्रति सम्मान, अनुशासन और संस्कारपूर्ण जीवन अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान आचार्यों ने गुरु-शिष्य परंपरा की गौरवशाली विरासत पर अपने विचार व्यक्त किए। विद्यार्थियों ने भी गुरु वंदना एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की। पूरे कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति, राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिक चेतना का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
अंत में विद्यालय परिवार ने महर्षि वेदव्यास के आदर्शों तथा गुरु परंपरा के मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में विद्यालय के सभी आचार्यगण, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। गुरु पूर्णिमा का यह आयोजन विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा, संस्कार और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति श्रद्धा जागृत करने वाला सिद्ध हुआ।





















































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