राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ द्वारा आलोचना की धरती और नामवर सिंह पर हुई गोष्ठी
मऊ।घोसी।जन संस्कृति मंच, मऊ एवं राहुल सांकृत्यायन सृजनपीठ के संयुक्त तत्वाधान में 22 मार्च को नामवर सिंह जन्मशती समारोह के अवसर पर आलोचना की धरती और नामवर सिंह विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल ने नामवर सिंह की आलोचकीय दृष्टि पर अपनी बात रखते हुए कहा कि नामवर सिंह ने हिन्दी आलोचना को सामाजिक कर्म से जोड़ते हुए उसे सिर्फ स्वाभिमान ही नहीं बल्कि एक मजबूत वैचारिक रीढ़ भी प्रदान की। उन्होंने पश्चिम से टूल्स ग्रहण करके हिन्दी आलोचना को सजग बनाया और साहित्य की पुनर्व्याख्या की। प्रो शुक्ल ने आगे कहा कि नामवर सिंह मार्क्सवाद की जड़ और स्थूल सौन्दर्यशास्त्र से आगे जाते हैं तथा छायावादी आलोचना को भी राष्ट्रीय जागरण से जोड़ देते हैं। उन्होंने आलोचना को भाववाद से मुक्त कर उसे यथार्थवाद से जोड़ा तथा फासीवाद और पूंजीवाद का मुखर विरोध किया। उन्होंने आगे कहा कि नामवर सिंह ने कभी किसी प्रतिमान के दायरे में रहकर किसी का मूल्यांकन नहीं किया, उनकी आलोचकीय दृष्टि सबसे अलग और स्वतंत्र थी।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि और आलोचक शिव कुमार पराग ने कहा कि नामवर सिंह सिर्फ रचना के ही आलोचक नहीं थे, वे समय और समाज के भी आलोचक थे। प्रगतिशील साहित्य को उन्होंने नई दिशा दी और हिंदी आलोचना को प्रासंगिक बनाया। फासीवाद की प्रेतछाया से संघर्ष ही नामवर की आलोचना की धुरी है। नामवर सिंह ने दलित अस्मितावादी लेखन का खुलकर विरोध किया और कई जगह मंचों से भी दलित लेखन को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कीं। दलित लेखकों में भाषा और सौन्दर्यशास्त्र का अभाव है, कहकर उन्हें खारिज करने का प्रयास किया। नामवर सिंह मार्क्सवाद आलोचक होते हुए डी - क्लास तो हुए लेकिन डी - कास्ट नहीं हो पाए। डॉ संजय राय ने कहा कि नामवर सिंह स्वातंत्र्योत्तर काल के आलोचक हैं और अपनी आलोचना में उन्होंने कलावाद का विरोध किया। उनकी आलोचकीय दृष्टि बिल्कुल स्पष्ट और समाज सापेक्ष थी।
युवा आलोचक डॉ विजय रंजन ने कहा कि नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को पश्चिम की औपनिवेशिक आलोचना से मुक्त करने का प्रयास किया। उन्होंने संस्थानों को भी औपनिवेशिक ढांचे से मुक्त करने की बात अपनी आलोचना के माध्यम से की है। डॉ रंजन ने आगे कहा कि नामवर सिंह का मानना था कि हमारी शिक्षा पद्धति ने हमको साहब तो बना दिया लेकिन हमारे भारतीय होने का गौरव हमसे छीन लिया। दलित अस्मितावादी लेखन की आलोचना पर नामवर सिंह से अपनी असहमति जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि दलित साहित्य किसी वातानुकूलित कमरे में बैठकर लिखा गया साहित्य नहीं है। यह सदियों से भोगी हुई पीड़ा का साहित्य है। और मुख्य धारा के साहित्य को इसे स्वीकारना होगा। संगोष्ठी का आधार वक्तव्य देते हुए युवा आलोचक डॉ विंध्याचल यादव ने कहा कि नामवर सिंह ने डॉ नगेन्द्र, विजयदेव नारायण शाही और डॉ रामविलास शर्मा के बरक्स अपनी आलोचना को विकसित किया। नवऔपनिवेशिक पूंजीवादी हमले से नामवर सिंह बहुत सजग थे लेकिन दलित साहित्य को लेकर उनकी असहजता किसी से छुपी हुई नहीं है। नामवर सिंह एक ही टूल्स से किसी रचनाकार को बहुत बड़ा भी साबित कर देते थे और बहुत छोटा भी। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों पर सख्त टिप्पणी करते हुए नामवर सिंह ने उन्हें प्रतिक्रियावाद और दकियानूसी के अड्डे की संज्ञा दी।
युवा कवि और आलोचक डॉ विहाग वैभव ने कहा कि यदि एक ही टूल्स से कोई आलोचक किसी को बड़ा और छोटा दोनों रचनाकार साबित करता है तो यह उसकी प्रतिभा नहीं बल्कि कमजोरी है। नामवर सिंह प्रकाशकों और अवसरवादी राजनीति से कभी मुक्त होने की कोशिश नहीं की बल्कि उन्होंने उस अवसर को भुनाया। डॉ विहाग ने अपनी तीन महत्वपूर्ण कविताएं भी सुनाईं। डॉ धनंजय शर्मा ने कहा कि नामवर सिंह की आलोचना का प्रमुख केंद्र कहानी और नई कहानी है। दूसरी परंपरा की खोज के माध्यम से नामवर सिंह ने हाशिये पर पड़े साहित्य को मुख्य धारा में लाने की कोशिश की। डॉ आर्यपुत्र दीपक ने कहा कि नामवर सिंह ने अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों को नए रूप में और नए संदर्भ में स्थापित करने का प्रयास किया।
संगोष्ठी में आए अतिथियों का स्वागत वरिष्ठ साहित्यकार और राहुल सांकृत्यायन सृजनपीठ के संस्थापक डॉ जयप्रकाश धूमकेतु ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ रामनरेश राम तथा धन्यवाद ज्ञापन जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज कुमार सिंह ने किया।
इस अवसर पर डॉ रामविलास भारती, फखरे आलम, मनोज सिंह, राजकुमार, डॉ तेजभान, अखिलेश, सत्यम, बृकेश यादव,अब्दुल अज़ीम खा, वीरेंद्र कुमार, सत्य प्रकाश सिंह, एडवोकेट, रामनवल, मुशाफिर यादव, राघवेंद्र जी, उषा सिंह, गुड्डू, मर्छू,, विजय,बसंत कुमार सहित सैकड़ो लोग उपस्थित रहे ।
























































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