भक्ति का दिव्य फल है परमात्मा की प्राप्ति
देवरिया।देवरिया जनपद के अंतर्गत ग्राम सभा कुंडावल तारा में चल रहे श्रीमद् भागवत कथा के द्वितीय दिवस कथा व्यास परम पूज्य श्री ब्रजेश मणि त्रिपाठी जी महाराज ने भागवत कथा के प्रथम स्कंध के मंगलाचरण से कथा को प्रारंभ किया। कथा व्यास ने बताया जब तक जीवन में आचरण मंगलमय नहीं होगा तब तक जीवन में भक्ति का सूत्रपात नहीं हो सकता है। भक्ति को प्राप्त करने हेतु बुद्धि को शुद्ध करना होगा और बुद्धि को शुद्ध करने हेतु सतत कथा रूपी सत्संग में गोता लगाना पड़ेगा। मंगलाचरण का पहला श्लोक कर्मकांडी पद्धति है, दूसरा श्लोक उपासना की पद्धति है और तीसरा श्लोक भक्ति का दिव्य फल है। परमात्मा की प्राप्ति में जानना और मानना मुख्य है। पारमार्थिक उन्नति भविष्य की वस्तु नहीं है, और सांसारिक उन्नति वर्तमान की वस्तु नहीं है।
असत का अभाव है- यह सत्य है और सत् का भाव है- यह भी सत्य है। अतः सत्य को ही स्वीकार करना है, सत्य को स्वीकार करोगे तो सत्य की प्राप्ति हो जायगी। भगवान् के सिवाय कुछ भी नहीं है, यही सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक दृष्टि है।
यही दृष्टि श्री व्यास जी को प्राप्त हुई तो आदरणीय व्यास जी ने 18000 श्लोकों की पावन संहिता तैयार करी जिसे हम सभी श्रीमद्भागवत के रूप में जानते हैं। व्यास जी के पुत्र श्री शुकदेव स्वामी ने राजा परीक्षित को यही दृष्टि प्रदान करी जिससे राजा परीक्षित मुक्त हो गये।
अतः सभी भक्तों को सदैव परमात्मा का चिंतन करना चाहिए, और संपूर्ण संसार में उन्हीं का दर्शन करना चाहिए। कथा में आगे शुकदेव स्वामी का आगमन सृष्टि के सृजन का वर्णन, भागवत के दस लक्षणों का निरूपण करते हुए विराट पुरुष का वर्णन किया गया।
इस अवसर पर कथा के मुख्य यजमान अशोकनाथ तिवारी, विश्वेश्वरनाथ तिवारी, लक्ष्मणनाथ तिवारी, विजयनाथ तिवारी, राजबहादुर नाथ तिवारी, योगेश्वरनाथ तिवारी, पशुपतिनाथ तिवारी, अनंतनाथ तिवारी, रघुपति नाथ तिवारी, सौरभ तिवारी, गौरव जी, विट्ठल नाथ तिवारी, आलोक, आदित्य, प्रथम, ओंकार, योगेन्द्र द्विवेदी, अनिल मिश्रा मृत्युंजय पांडेय आदि उपस्थित रहे।






















































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