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गृहस्ती बोझ नहीं जीवन का अंग है,आचार्य बृजेश मणि त्रिपाठी

देवरिया।जनपद के लार ब्लाक के कुंडावल तारा में चल रहे
श्रीमद्भागवत कथा के मंगलमय विश्राम, दिवस पर आचार्य बृजेश मणि त्रिपाठी ने श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराते हुए कहा कि रूक्मिणी अर्थात जीव का पाणिग्रहण संस्कार जब ईश्वर के साथ होता है तभी तो जीव पूर्ण होता है। भगवान का मंगलमय 16108 विवाह संपन्न हुआ। प्रभु के हर एक भार्या से 10 पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ, इस प्रकार भगवान का करोड़ों का परिवार है फिर भी द्वारिकाधीश प्रभु कभी चिंता या क्लेश में रहे क्योंकि ईश्वर ने गृहस्थी को बोझ नहीं, जीवन को अंग माना है।
अतः श्री ठाकुर जी की गृहस्थी से हम सभी को यह सीख लेनी चाहिए और अपनी गृहस्थी को आनंदित करना चाहिए। 
पूज्य उड़िया बाबा कहते है कि इन पाँच बातों का त्याग ज्ञानी और भक्त सभी साधकों को करना चाहिये :-
(१) व्यर्थ चिन्तन।
(२) व्यर्थ भाषण।
(३) व्यर्थ दर्शन।
(४) व्यर्थ श्रवण ।
(५) व्यर्थ भ्रमण।
ये साधना और जीवन दोनों को संतुलित करने के लिए बहुत उपयोगी मार्गदर्शन देते हैं:
(१) व्यर्थ चिन्तन
ऐसे विचार जो न तो समाधान देते हैं और न ही मन को शांति—जैसे अतीत की बेकार चिंता या भविष्य का अनावश्यक भय—उन्हें छोड़ना आवश्यक है। इससे मन एकाग्र और स्थिर होता है।
(२) व्यर्थ भाषण
बिना आवश्यकता के बोलना, चुगली, नकारात्मक या कटु वचन—ये ऊर्जा को नष्ट करते हैं और संबंधों को भी प्रभावित करते हैं। संयमित और सार्थक वाणी साधक की पहचान होती है।
(३) व्यर्थ दर्शन
ऐसी चीज़ें देखना जो मन में विकार, अशांति या व्याकुलता उत्पन्न करें—उनसे दूर रहना चाहिए। आँखों के माध्यम से जो हम ग्रहण करते हैं, वह सीधे मन पर प्रभाव डालता है।
(४) व्यर्थ श्रवण
अनावश्यक या नकारात्मक बातें सुनना—जैसे अफवाहें, विवाद, या निरर्थक चर्चा—मन को दूषित कर सकती हैं। इसके बजाय सत्संग, ज्ञानवर्धक बातें सुनना अधिक लाभकारी है।
(५) व्यर्थ भ्रमण
बिना उद्देश्य के इधर-उधर भटकना समय और ऊर्जा की हानि करता है। हर कार्य और यात्रा का एक स्पष्ट उद्देश्य होना चाहिए।
सार बात यह है कि....
इन पाँच त्यागों का उद्देश्य जीवन को खाली या कठोर बनाना नहीं, बल्कि उसे अधिक सचेत, केंद्रित और शांत बनाना है। जब हम अनावश्यक चीज़ों को छोड़ते हैं, तब हमारे पास सही कार्यों और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अधिक समय और ऊर्जा बचती है।


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