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दीप पर्व दीपवाली से पूर्व मनाये जाने वाले पर्वो की महत्ता डॉ अजय कुमार मिश्र

देवरिया।भारतीय संस्कृति में हर पर्व की अपनी महत्ता है विशेष रूप से दीप पर्व दीपावली के पूर्व एक लम्बी श्रृंखला में मनाये जाने वाले पर्व का लोक जीवन में विशेष महत्व है .भारत की सनातन संस्कृति में दीपावली केवल दीपों का उत्सव नहीं, अपितु लोकमंगल, सामाजिक समरसता, प्रकृति-संरक्षण, पारिवारिक सद्भाव और आध्यात्मिक चेतना का महापर्व है। दीपावली से पूर्व मनाए जाने वाले धनतेरस, नरक चतुर्दशी (छोटी दीपावली), गोवत्स द्वादशी तथा रूप चतुर्दशी जैसे पर्व भारतीय जीवन-दर्शन में धर्म, लोकाचार और सांस्कृतिक मूल्यों की गहरी जड़ों को अभिव्यक्त करते हैं।
1. धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्ता::
         धनतेरस आरोग्य, समृद्धि एवं शुभता का प्रतीक है। भगवान धन्वंतरि की आराधना स्वास्थ्य के महत्त्व को रेखांकित करती है। नरक चतुर्दशी का पर्व नरकासुर-वध की पौराणिक स्मृति के माध्यम से अन्याय, अहंकार और नकारात्मकता पर सदाचार की विजय का संदेश देता है। दीपदान एवं स्वच्छता के माध्यम से बाह्य और आंतरिक शुद्धि की भावना पुष्ट होती है
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
— बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28)
   अर्थात् हमें अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। यह मंत्र इन पर्वों की आध्यात्मिक चेतना का सार है।
2. सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्ता:
          इन पर्वों का लोकजीवन से सीधा संबंध है। घरों की सफाई, पारंपरिक वस्तुओं की खरीद, दीप-निर्माण, रंगोली, पारिवारिक मिलन तथा परस्पर उपहार-विनिमय स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति देते हैं और सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ बनाते हैं। कुम्हार, शिल्पकार, व्यापारी एवं छोटे उद्यमी इस उत्सव-परंपरा के महत्त्वपूर्ण सहभागी हैं। गोवत्स द्वादशी तथा गोपूजन की परंपराएँ पशुधन के प्रति कृतज्ञता और कृषि-आधारित जीवन की महत्ता को भी अभिव्यक्त करती हैं।
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
   अर्थात् सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का कल्याण हो और कोई भी दुःख का भागी न बने। यही इन पर्वों की लोककल्याणकारी भावना है।
3. लोकजीवन से जुड़ाव:
     दीपावली-पूर्व के धार्मिक कृत्य केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि जीवन को व्यवस्थित, स्वच्छ और आनंदमय बनाने की सामूहिक प्रक्रिया हैं। घर-आँगन की सफाई स्वास्थ्य एवं स्वच्छता का संदेश देती है, दीप प्रज्वलन आशा और सकारात्मकता का प्रतीक बनता है तथा पारिवारिक सहभागिता पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक मूल्यों का हस्तांतरण करती है। इस प्रकार लोकपरंपराएँ धर्म को व्यवहार और संस्कृति को जीवन से जोड़ती हैं।
4. वर्तमान परिवेश में उपादेयता::
           आज के भौतिकतावादी एवं तनावपूर्ण जीवन में इन पर्वों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। इनका मूल संदेश है—उपभोग के स्थान पर संयम, प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग, आडंबर के स्थान पर सेवा तथा प्रदूषण के स्थान पर पर्यावरण-सम्मत उत्सव। मिट्टी के दीपों का प्रयोग, स्थानीय कारीगरों से खरीदारी, जरूरतमंदों की सहायता, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के प्रति जागरूकता तथा पटाखों के सीमित अथवा त्यागपूर्ण उपयोग से इन पर्वों को अधिक सार्थक बनाया जा सकता है। वस्तुतः दीपावली-पूर्व के धार्मिक कृत्य सनातन संस्कृति की उस जीवनदृष्टि के परिचायक हैं, जिसमें धर्म का उद्देश्य केवल आध्यात्मिक उन्नति नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण, सांस्कृतिक संरक्षण और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व भी है। इन पर्वों की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब दीप केवल घरों में नहीं, बल्कि मानव-हृदय में भी प्रज्वलित हों और उनका प्रकाश समस्त समाज के जीवन को आलोकित करे।


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