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"78 साल का देवरिया, फिर भी विश्वविद्यालय के लिए तरस रहा!"देवरिया

 देवरिया ।   विश्वविद्यालय’ के सरकारी दावे पर देवरिया का बड़ा सवाल—चार राजकीय, 7+ वित्तपोषित और 150+ स्ववित्तपोषित कॉलेज होने के बाद भी आखिर कब मिलेगा अपना विश्वविद्यालय?"
"सात विधानसभा, दो लोकसभा सीटें और प्रदेश सरकार में कद्दावर प्रतिनिधित्व… फिर भी उच्च शिक्षा के नक्शे पर देवरिया की अपनी पहचान कब?"
    उत्तर प्रदेश में ‘एक जनपद–एक उत्पाद’ से लेकर ‘एक जनपद–एक मेडिकल कॉलेज’ और ‘एक जनपद–एक विश्वविद्यालय’ तक की अवधारणाओं को विकास की नई तस्वीर के रूप में पेश किया जा रहा है। सरकार जिलों को उनकी जरूरत और क्षमता के अनुरूप मजबूत करने की बात कर रही है। लेकिन इसी तस्वीर में देवरिया का विश्वविद्यालय वाला खालीपन एक बड़ा सवाल बनकर सामने खड़ा है।
लगभग 78 वर्ष पहले अस्तित्व में आए देवरिया जिले में आज उच्च शिक्षा का विशाल नेटवर्क मौजूद है। जिले में चार राजकीय महाविद्यालय, सात से अधिक अशासकीय वित्तपोषित महाविद्यालय और 150 से अधिक स्ववित्तपोषित महाविद्यालय संचालित होने की बात सामने आती है। यानी महाविद्यालयों की कमी नहीं, विद्यार्थियों की कमी नहीं, उच्च शिक्षा की जरूरत की कमी नहीं—फिर कमी किस चीज की है?
"कमी है तो सिर्फ एक विश्वविद्यालय की।"और यही वह सवाल है जिसका जवाब देवरिया लंबे समय से तलाश रहा है।जब छोटे जिले आगे निकल गए, देवरिया क्यों पीछे?प्रदेश के कई छोटे जिलों में विश्वविद्यालय स्थापित हो चुके हैं। ऐसे में गोरखपुर से सटे देवरिया जैसे जिले में विश्वविद्यालय की स्थापना अब केवल शिक्षा से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। यह क्षेत्रीय विकास, युवाओं के भविष्य और सरकारी प्राथमिकताओं का सवाल बन चुका है।आखिर ऐसा क्या है कि सैकड़ों महाविद्यालयों वाले जिले को अब तक अपना विश्वविद्यालय नहीं मिल सका?क्या देवरिया में विद्यार्थियों की संख्या कम है?
क्या यहां उच्च शिक्षा का आधार कमजोर है?क्या विश्वविद्यालय के लिए जमीन उपलब्ध नहीं हो सकती?क्या वित्तीय संसाधन बाधा हैं?या फिर यह विषय सरकारी प्राथमिकताओं की सूची में अभी पर्याप्त ऊपर नहीं पहुंच पाया है?
 इन सवालों के जवाब कौन देगा?
"राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी कम नहीं"---देवरिया की राजनीतिक ताकत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिले में सात विधानसभा और दो लोकसभा क्षेत्र हैं। विधान परिषद में भी जिले का प्रतिनिधित्व है। प्रदेश सरकार में देवरिया से आने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता सूर्य प्रताप शाही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।फिर सवाल और सीधा हो जाता है—जब राजनीतिक प्रतिनिधित्व इतना मजबूत है, सत्ता में प्रभावशाली आवाज मौजूद है और सरकार ‘एक जनपद–एक विश्वविद्यालय’ जैसी अवधारणा पर जोर दे रही है, तो देवरिया की बारी कब आएगी?क्या विश्वविद्यालय के लिए सिर्फ मांग-पत्र, ज्ञापन और आश्वासन ही मिलते रहेंगे?
"कॉलेज बहुत, लेकिन अपना विश्वविद्यालय नहीं!"
   देवरिया के विद्यार्थियों के सामने एक अजीब स्थिति है। जिले में उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में महाविद्यालय हैं, लेकिन विश्वविद्यालय स्तर पर निर्णय लेने और शैक्षणिक नेतृत्व का अपना संस्थागत केंद्र नहीं।विश्वविद्यालय बनने से केवल एक नया परिसर नहीं बनेगा। इससे शोध, नए पाठ्यक्रम, स्थानीय जरूरतों पर अध्ययन, रोजगारपरक शिक्षा और अकादमिक गतिविधियों के लिए नया मंच तैयार हो सकता है।
फिर सवाल यही है—जब जरूरत दिखाई दे रही है तो निर्णय क्यों नहीं दिखाई दे रहा?
"अब आश्वासन नहीं, तारीख बताइए"
   देवरिया अब यह पूछ रहा है कि विश्वविद्यालय के लिए सरकार की योजना क्या है? यदि प्रस्ताव तैयार है तो उसकी स्थिति क्या है? जमीन कहां होगी? बजट कितना है? प्रक्रिया किस स्तर पर है? और सबसे अहम—विश्वविद्यालय कब तक शुरू होगा?क्योंकि सवाल अब यह नहीं है कि देवरिया को विश्वविद्यालय चाहिए या नहीं।
सवाल यह है कि 78 साल बाद भी देवरिया को इसके लिए इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के बीच यह मुद्दा जिले की राजनीति में कितना बड़ा बनता है, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन इतना तय है कि ‘एक जनपद–एक विश्वविद्यालय’ की बात जब प्रदेश में हो रही हो, तब देवरिया के लोग अपने जिले का नाम उस सूची में देखने का हकदार सवाल जरूर पूछेंगे।
"सबसे बड़ा सवाल"
“अगर अब नहीं, तो फिर कब? और देवरिया को विश्वविद्यालय आखिर देगा कौन?”


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