श्रीरामचरितमानस पर विशेष। आचार्य ब्रजेश मणि त्रिपाठी
देवरिया।सुमति कुमति सब के उर रहहीं ।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं ।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना ।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ।
( सुंदरकांड 39/3)
राम राम बंधुओं, हनुमान जी लंका जला कर राम जी के पास लौट आए है । पहले मंदोदरी रावण को समझाती है , अब बिभीषण उसे समझाते हुए कहते हैं कि नाथ ! वेद पुराण ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि व कुबुद्धि सब के ह्रदय में रहती है । जहाँ अच्छी बुद्धि है वहाँ हर प्रकार की संपदा रहती है तथा जहाँ खोटी बुद्धि का वास होता है वहाँ परिणाम में विपत्ति अर्थात् दुख रहता है।
मित्रों , आपके ह्रदय में , मन में राम जी का वास है ,राम चिंतन है , राम प्रियता है तो समझिए आप सुबुद्धि रखते हैं और जीवन केवल उलझनों तथा कलह में बीत रहा है तो आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है ? अस्तु सुख चाहते हैं तो सुखनिधान को अपनी मति में पधराएं एवं राम जी को अपनाएँ।
























































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