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भाषा शिक्षकों पर है समाज को नई दिशा देने की जिम्मेदारी - कुलपति

- राणा प्रताप पीजी कालेज में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन विद्वानों ने रखे विचार 
सुलतानपुर। भाषायें हमको जोड़ती हैं। भारतीय भाषाओं के दुश्मन उसके अध्यापक हैं। भाषा शिक्षकों पर समाज को नई दिशा में ले जाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है जो आजकल नहीं दिखाई पड़ती है। आज के भाषा शिक्षक शिक्षण में भाव , उच्चारण और ध्वनि का ध्यान नहीं रख पाते। संस्कृत का सबसे बड़ा नुकसान उनके शिक्षकों के कारण हुआ है। यह बातें डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिजेन्द्र सिंह ने कही। 
वह राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के विवेकानंद सभागार में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की भारतीय भाषा समिति द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित कर रहे थे।
भारतीय भाषा परिवार अंतर्सम्बंध और सांस्कृतिक संवाद विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन के मुख्य वक्ता भारतीय भाषा समिति के महासचिव व काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अभिनव मिश्र ने कहा कि भारत में भाषाओं को कभी भी विशिष्ट पहचान के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाता था। कोई व्यक्ति विभिन्न भाषाओं में सोच सकता था प्रार्थना कर सकता था व्यापार कर सकता था और शासन कर सकता था वह भी बिना किसी भेदभाव के। भारत की भाषिक परंपरा विश्व की सर्वाधिक जटिल और दीर्घजीवी परम्पराओं में से एक है।
सम्मेलन में आनलाइन जुड़े दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व भाषा विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रमेश चंद्र शर्मा ने कहा कि भारतीय भाषा परिवार भाषाओं के सह अस्तित्व को स्वीकार करता है। संसार के किसी भी भूभाग में इतनी अधिक भाषाएं नहीं मिलतीं जितनी भारत में हैं। भारत भाषाई दृष्टि से दुनिया का सबसे समृद्ध देश है। 
अध्यक्षता करते हुए क्षत्रिय शिक्षा समिति के अध्यक्ष एडवोकेट संजय सिंह ने कहा कि भाषाई बहुलता ने भारत में बौद्धिक आदान-प्रदान और सामाजिक सामंजस्य को मजबूत किया।
 संचालन हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर इन्द्रमणि कुमार स्वागत प्राचार्य प्रोफेसर दिनेश कुमार त्रिपाठी व आभार ज्ञापन प्रबंधक एडवोकेट बालचंद्र सिंह ने किया।
सम्मेलन में द्वितीय सत्र के मुख्य वक्ता रामजस कालेज दिल्ली में प्रोफेसर उमाशंकर पाण्डेय ने कहा भारतीय भाषाओं की एकता में विविधता है। अंग्रेजों ने भारतीय भाषाओं को कई समूहों में बांट दिया। भाषायें और संस्कृति आपस में जुड़ी हुई हैं अंग्रेजों ने इसमें विभाजन के बीज बोये ।
अध्यक्ष मुम्बई विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रामजी तिवारी ने कहा भारत के लोग भाषा को केवल संवाद का साधन ही नहीं मानते यहां भाषा के प्रति आदर भाव बहुत व्यापक है। यह भगवती शक्ति के रूप में पूजित है। हमने सदैव सभी भाषाओं का आदर किया है । अंग्रेजों ने बहुत ही सुनियोजित तरीके से भारतीय भाषाओं को विस्थापित करने का कार्य किया।
विशिष्ट अतिथि के एन आई टी निदेशक प्रोफेसर आर के उपाध्याय ने बताया कि विद्यार्थियों को उसकी भाषा में हर तरह का ज्ञान मिले यह आज की जरूरत है। इसको देखते हुए तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम अब क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध हो रहे हैं।
 संचालन असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ प्रभात कुमार श्रीवास्तव ने किया।
इस अवसर पर गनपत सहाय पीजी कालेज के प्राचार्य प्रोफेसर अंग्रेज सिंह राणा ,अवध विश्वविद्यालय शिक्षक संघ अध्यक्ष डॉ जनमेजय तिवारी, पूर्व प्राचार्य डॉ एस.बी.सिंह , प्रोफेसर एम पी सिंह, प्रोफेसर राधेश्याम सिंह, कमल नयन पाण्डेय, डॉ.एम.पी.सिंह , पूर्व प्रबंधक एडवोकेट बजरंग बहादुर सिंह, सुरेन्द्र नाथ सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि व डॉ संतोष अंश समेत विभिन्न महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर भारतीय भाषा समिति द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों भारतीय भाषा परिवार ए न्यू फ्रेम वर्क इन लिंग्विस्टिक और कलेक्टेड स्टडीज आन भारतीय भाषा परिवार प्रेसपेक्टिव्स एंड हारिजंस का लोकार्पण भी किया गया। मंचस्थ अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन व मां सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महाराणा प्रताप के चित्रों पर पुष्पार्चन कर कार्यक्रम की शुरुआत की । महाविद्यालय के अध्यक्ष, प्रबंधक और प्राचार्य ने अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह व पुष्प गुच्छ भेंट कर अतिथियों को सम्मानित किया।


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