अगर हर युवा चुनाव लड़े तो क्या होगा? लोकतंत्र की नई परीक्षा
•403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में यदि हर योग्य युवा चुनावी मैदान में उतरे, तो क्या राजनीति का चेहरा बदल सकता है?
विशेष लेख।भारत में अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते? लेकिन शायद अब सवाल को थोड़ा बदलने का समय है—अगर अच्छे, शिक्षित और योग्य युवा राजनीति में आने के बजाय खुद चुनाव लड़ना शुरू कर दें तो क्या होगा?
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों को ही उदाहरण मान लीजिए। जिस तरह संघ लोक सेवा आयोग किसी परीक्षा के लिए वैकेंसी निकालता है और देशभर से युवा आवेदन करते हैं, उसी तरह यदि विधानसभा की प्रत्येक सीट को लोकतांत्रिक सेवा का एक अवसर मान लिया जाए और उस क्षेत्र के योग्य युवा चुनावी मैदान में उतरें, तो राजनीति का पूरा गणित बदल सकता है।
यह विचार फिलहाल एक कल्पना है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत अक्सर ऐसी ही कल्पनाओं से निकलती है।
दिव्या मित्तल के इस्तीफे ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया
पूर्व IAS अधिकारी दिव्या मित्तल के प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा देने और राजनीति में प्रवेश की घोषणा ने इस बहस को नया संदर्भ दिया है। उन्होंने कहा है कि वे उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं, जिनकी समस्याएं सरकारी कार्यालयों तक नहीं पहुंचतीं या पहुंचने के बाद भी सुनी नहीं जातीं। उन्होंने उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत का स्थान बताया है और किसी राजनीतिक दल के झंडे के बजाय जनता के साथ काम करने की बात कही है।
यहां मुद्दा सिर्फ एक अधिकारी के राजनीति में आने का नहीं है।
मुद्दा यह है कि आखिर राजनीति में जाने का अधिकार और अवसर कितने लोगों के पास है?
क्या राजनीति केवल उन लोगों का क्षेत्र है जिनके पास संगठन, पैसा, पहचान, राजनीतिक परिवार या वर्षों पुराना नेटवर्क है?
या फिर राजनीति भी UPSC की तरह ऐसी प्रतिस्पर्धा हो सकती है, जिसमें कोई भी योग्य नागरिक अपनी क्षमता, विचार और जनता के भरोसे के आधार पर मैदान में उतर सके?
विधानसभा की सीट को 'लोकसेवा की वैकेंसी' क्यों न माना जाए?
कल्पना कीजिए कि किसी विधानसभा क्षेत्र में 25, 50 या 100 योग्य युवा चुनाव लड़ते हैं।
कोई शिक्षक है।
कोई डॉक्टर है।
कोई इंजीनियर है।
कोई किसान परिवार से आया है।
कोई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है।
कोई सामाजिक कार्यकर्ता है।
कोई महिला उद्यमी है।
कोई पूर्व सैनिक है।
कोई ऐसा युवा है जिसने गांव की समस्याओं को नजदीक से देखा है।
इनमें से प्रत्येक व्यक्ति अपनी योजना, अपना घोषणापत्र और अपना विजन जनता के सामने रखे।
फिर जनता तय करे कि किसे विधानसभा भेजना है।
क्या यह लोकतंत्र को और अधिक प्रतिस्पर्धी नहीं बनाएगा?
भारत में चुनाव पहले से ही जनता के मतदान से होते हैं, लेकिन उम्मीदवार बनने की प्रक्रिया में सामाजिक और आर्थिक बाधाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। निर्वाचन आयोग उम्मीदवारों के नामांकन, पात्रता और उम्मीदवारों से संबंधित जानकारी के लिए औपचारिक व्यवस्था रखता है; उम्मीदवारों के हलफनामे भी सार्वजनिक किए जाते हैं।
यानी व्यवस्था का दरवाजा खुला है। सवाल यह है कि उस दरवाजे तक कितने लोग पहुंचने की हिम्मत करते हैं?
यदि हर युवा चुनाव लड़े तो सबसे बड़ा फायदा क्या होगा?
सबसे पहला फायदा होगा—राजनीति में विकल्पों की संख्या बढ़ना।
जब किसी सीट पर केवल कुछ प्रमुख उम्मीदवार होते हैं, तो मतदाता अक्सर उपलब्ध विकल्पों में से ही चुनाव करता है। लेकिन यदि बड़ी संख्या में योग्य उम्मीदवार सामने आएं तो मतदाता के पास व्यक्तित्व के साथ-साथ नीतियों और स्थानीय मुद्दों की तुलना करने का अवसर बढ़ सकता है।
दूसरा फायदा होगा—स्थानीय मुद्दों की आवाज मजबूत होना।
हर उम्मीदवार अपने क्षेत्र की एक अलग समस्या सामने ला सकता है। कहीं रोजगार बड़ा मुद्दा है, कहीं सड़क, कहीं सिंचाई, कहीं शिक्षा, कहीं स्वास्थ्य और कहीं पलायन।
तीसरा फायदा होगा—राजनीतिक दलों पर दबाव।
मनमानी परिवारवाद, पुत्रवाद, पार्टीवाद समाप्त हो जायेगा
यदि युवाओं का बड़ा वर्ग स्वतंत्र रूप से चुनावी राजनीति में उतरता है तो स्थापित दलों को भी नए चेहरों, बेहतर उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है।
चौथा और शायद सबसे महत्वपूर्ण फायदा—राजनीति के प्रति युवाओं की मानसिकता बदलना।
आज बड़ी संख्या में युवा राजनीति को दूर से देखते हैं। वे नेताओं पर चर्चा करते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं, सोशल मीडिया पर बहस करते हैं, लेकिन स्वयं राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने से पीछे रहते हैं।
अगर वही युवा कहे—
"सिर्फ शिकायत क्यों करें? चुनाव ही लड़ लेते हैं।"
तो लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका केवल मतदाता तक सीमित नहीं रहेगी।
लेकिन क्या हर व्यक्ति का चुनाव लड़ना लोकतंत्र को मजबूत ही करेगा?
यहां कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अधिक उम्मीदवार हमेशा बेहतर लोकतंत्र की गारंटी नहीं होते।
यदि किसी विधानसभा में सैकड़ों उम्मीदवार मैदान में उतर जाएं तो मतों का अत्यधिक बिखराव हो सकता है। किसी उम्मीदवार को बहुत कम प्रतिशत वोट के साथ भी जीत हासिल हो सकती है, क्योंकि भारत में विधानसभा चुनाव 'सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार' जीतता है, जरूरी नहीं कि उसे कुल मतों का 50 प्रतिशत मिले।
इसलिए केवल उम्मीदवारों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है।
जरूरी है कि उम्मीदवार गंभीर, सक्षम और जवाबदेह भी हों।
चुनाव को UPSC समझना भी गलत होगा
UPSC में उम्मीदवार परीक्षा देता है, चयन होता है और फिर पद मिलता है।
चुनाव इससे बिल्कुल अलग प्रक्रिया है।
यहां कोई एक आयोग उम्मीदवार की योग्यता तय करके उसे विधायक नहीं बनाता। यहां अंतिम फैसला जनता करती है।
इसलिए विधायक का पद केवल नौकरी या सरकारी पोस्ट नहीं है।
यह जनप्रतिनिधित्व का संवैधानिक दायित्व है।
इसीलिए यदि युवाओं को राजनीति में आना है तो उन्हें केवल चुनाव जीतने की रणनीति नहीं, बल्कि संविधान, कानून, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, बजट, स्थानीय शासन और सार्वजनिक नीति को भी समझना होगा।
लोकतंत्र केवल वोट देने से पूरा नहीं होता
लोकतंत्र का अर्थ केवल पांच साल में एक बार मतदान करना नहीं है।
लोकतंत्र का एक बड़ा अर्थ यह भी है कि नागरिक सत्ता के सवाल पूछे, नीतियों पर चर्चा करे, चुनाव लड़े, जनप्रतिनिधि बने और चुने जाने के बाद जनता के प्रति जवाबदेह रहे।
इस अर्थ में यदि योग्य युवा बड़ी संख्या में राजनीति में आते हैं तो यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक परिवर्तन हो सकता है।
लेकिन एक शर्त के साथ—
राजनीति को करियर से पहले सार्वजनिक जिम्मेदारी समझना होगा।
इसके नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं
अगर बिना तैयारी और केवल लोकप्रियता के आधार पर बड़ी संख्या में लोग चुनाव लड़ने लगें तो चुनाव प्रक्रिया पर अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है।
सोशल मीडिया की लोकप्रियता और वास्तविक जनसेवा के बीच अंतर मिट सकता है।
पैसा, प्रचार और व्यक्तिगत ब्रांड उम्मीदवार की वास्तविक क्षमता पर हावी हो सकते हैं।
कुछ लोग केवल प्रसिद्धि के लिए चुनाव लड़ सकते हैं।
और सबसे बड़ा खतरा यह है कि यदि राजनीति में प्रवेश का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना बन जाए तो उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने के बावजूद राजनीति की गुणवत्ता जरूरी नहीं कि बढ़े।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने युवा चुनाव लड़ रहे हैं?
सवाल होना चाहिए—
कितने युवा तैयारी के साथ चुनाव लड़ रहे हैं?
राजनीति में प्रवेश का मतलब सिर्फ विधायक बनना नहीं
लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए हर युवा का विधायक बनना जरूरी नहीं है।
कोई ग्राम पंचायत से शुरुआत कर सकता है।
कोई नगर निकाय में काम कर सकता है।
कोई सामाजिक संगठन बना सकता है।
कोई नीति अनुसंधान कर सकता है।
कोई अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधि से लगातार सवाल पूछ सकता है।
कोई चुनावी घोषणापत्र तैयार कर सकता है।
कोई स्वतंत्र उम्मीदवार के चुनाव अभियान में काम कर सकता है।
यानी राजनीति का अर्थ केवल विधानसभा की कुर्सी नहीं है।
राजनीति का अर्थ है—सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी।
403 सीटें, करोड़ों नागरिक और हजारों संभावित उम्मीदवार
उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा क्षेत्र हैं। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों में भी उत्तर प्रदेश को 403 विधानसभा खंडों वाला राज्य बताया गया है।
अब कल्पना कीजिए कि इन 403 क्षेत्रों में हजारों युवा अपने-अपने मुद्दों के साथ सामने आते हैं।
तब चुनाव केवल पार्टी बनाम पार्टी नहीं रहेगा।
वह हो सकता है—
स्थानीय समस्या बनाम समाधान।
पुरानी राजनीति बनाम नई सोच।
घोषणा बनाम उसका रोडमैप।
जातीय समीकरण बनाम विकास का एजेंडा।
और अंततः—
उम्मीदवार बनाम उम्मीदवार।
यही प्रतिस्पर्धा राजनीति को अधिक जवाबदेह बनाने का एक रास्ता बन सकती है।
लेकिन लोकतंत्र की अंतिम शक्ति जनता ही रहेगी
इस पूरे विचार में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लोकतंत्र को किसी एक नेता, पार्टी या नए राजनीतिक चेहरे से नहीं जोड़ा जा सकता।
दिव्या मित्तल का राजनीति में प्रवेश एक व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय है। उनकी घोषणा ने सार्वजनिक जीवन में एक नई बहस जरूर पैदा की है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि राजनीति में प्रवेश करने वाला हर प्रशासनिक अधिकारी या हर युवा व्यवस्था को बदल देगा।
व्यवस्था तब बदलती है जब नागरिक जागरूक होता है, उम्मीदवार जवाबदेह होता है और मतदाता अपने मत का इस्तेमाल सोच-समझकर करता है।
शायद भविष्य का सवाल यही है
भारत को ऐसी राजनीति चाहिए जिसमें राजनीति में आने के लिए किसी खास परिवार में जन्म लेना जरूरी न हो।
जहां एक सामान्य युवक भी कह सके—
"मेरे पास पैसा कम हो सकता है, राजनीतिक विरासत नहीं हो सकती, लेकिन मेरे पास अपने क्षेत्र के लिए एक विचार है और जनता के सामने रखने का अधिकार है।"
लेकिन इसके साथ दूसरी जिम्मेदारी भी है—
उम्मीदवार बनने की आजादी के साथ जनता को उम्मीदवारों को परखने की आदत भी विकसित करनी होगी।
क्योंकि लोकतंत्र की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि कितने लोग चुनाव लड़ रहे हैं।
वह इस बात से तय होती है कि—
कितने योग्य लोग मैदान में हैं, कितने ईमानदारी से मुद्दे उठा रहे हैं और कितने चुने जाने के बाद जनता के प्रति जवाबदेह बने रहते हैं।
यदि भारत का हर योग्य युवा राजनीति को केवल आलोचना का विषय न मानकर लोकसेवा का क्षेत्र समझे और लोकतांत्रिक नियमों के भीतर चुनावी मैदान में उतरने का साहस करे, तो इससे राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और मतदाताओं—तीनों पर सकारात्मक दबाव बन सकता है।
लेकिन “हर युवा चुनाव लड़े” अपने आप में लोकतंत्र का अंतिम लक्ष्य नहीं है।
असली लक्ष्य होना चाहिए—
हर नागरिक को राजनीति में आने का समान अवसर मिले, हर उम्मीदवार को जनता के सामने अपनी बात रखने का अवसर मिले और हर मतदाता को बिना दबाव के सबसे योग्य प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिले।
तभी लोकतंत्र केवल चुनाव की प्रक्रिया नहीं रहेगा।
वह वास्तव में जनता की भागीदारी की व्यवस्था बनेगा।






















































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