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कंक्रीट के बनते मकान और कटते जंगल के कारण, गौरैया की संख्या हो रही कम

देवरिया।कभी घर के आंगन एवं खेत खलिहानों में चहचहाने वाली गौरैया की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। बदलते शहरी परिवेश, बढ़ते कंक्रीट के जंगल और प्रकृति से बढ़ती दूरी को इस नन्ही चिड़िया के विलुप्त होने का मुख्य कारण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पुराने कच्चे घर, छप्पर और खुली मुंडेरें अब सीमेंट-कंक्रीट की आधुनिक इमारतों में बदल गई हैं। इन नई संरचनाओं में गौरैया को घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त जगह नहीं मिल पाती। इसके अतिरिक्त, पेड़ों और झाड़ियों की अंधाधुंध कटाई से उनके प्राकृतिक आश्रय स्थल समाप्त हो रहे हैं। खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से कीट-पतंगों की संख्या में कमी आई है, जो गौरैया का मुख्य भोजन होते हैं।
जिलाधिकारी ने कहा कि गौरैया कभी हर घर-आंगन में आसानी से दिखाई देती थी वह शहरीकरण और कंक्रीट के बढ़ते विस्तार के कारण तेजी से गायब हो रही है। उन्होंने आमजन से अपील की कि वे अपने घरों की छत और बालकनी में बर्ड हाउस लगाएं और नियमित दाना-पानी रखें तथा अधिकाधिक पेड़-पौधे लगाएं, ताकि गौरैया को सुरक्षित वातावरण मिल सके।
अत्यधिक विकिरण भी पक्षियों के प्राकृतिक व्यवहार और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रहा है। पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि घर-आंगन की जीवंतता और पारिस्थितिक संतुलन का महत्वपूर्ण प्रतीक है। गौरैया की अनुपस्थिति हमें प्रकृति से बढ़ती दूरी का एहसास कराती है। यदि समय रहते संरक्षण के कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इसकी चहचहाहट को केवल कहानियों और तस्वीरों में ही देख और सुन पाएंगी।


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