सिनेमा ने खो दिया अपना ‘नाना’… गरीबी में बीता बचपन, 13 साल की उम्र में शुरू किया काम, फिर अभिनय की दुनिया पर छोड़ी अमिट छाप
मुंबई/गोवा। भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन की खबर ने फिल्म जगत और उनके करोड़ों प्रशंसकों को गहरे सदमे में डाल दिया है। 75 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाले नाना पाटेकर का जीवन केवल फिल्मों में सफलता की कहानी नहीं था, बल्कि गरीबी, संघर्ष, पारिवारिक मुश्किलों और अपनी मेहनत से पहचान बनाने की प्रेरक गाथा भी था।
विश्वनाथ से ‘नाना’ बनने तक का सफर
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1951 में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता कपड़े के कारोबार से जुड़े थे, जबकि मां गृहिणी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति हमेशा मजबूत नहीं रही।
नाना ने खुद अपने एक इंटरव्यू में अपने बचपन के संघर्ष को याद करते हुए बताया था कि उन्होंने महज 13 वर्ष की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। पढ़ाई के साथ काम करना उनकी मजबूरी थी। उन्होंने उस दौर में बेहद कम कमाई में गुजारा किया और कई बार खाने तक की परेशानी का सामना किया।
पोस्टर पेंट किए, सड़क की जेब्रा क्रॉसिंग भी रंगी
फिल्मों के बड़े पर्दे पर अपनी दमदार आवाज से लोगों को प्रभावित करने वाले नाना ने कभी फिल्मों के पोस्टर पेंट किए, तो कभी सड़क की जेब्रा क्रॉसिंग रंगकर पैसे कमाए। एक दौर में उन्हें पोस्टर बनाने के लिए महज कुछ रुपये मिलते थे। संघर्ष के इसी दौर ने उन्हें जिंदगी की कठोर सच्चाइयों से रूबरू कराया।
पढ़ाई और काम के साथ-साथ उनका झुकाव रंगमंच की तरफ बढ़ता गया। थिएटर ने उनके भीतर के कलाकार को पहचान दी और धीरे-धीरे यही संघर्ष उन्हें फिल्मों तक ले गया।
परिवार पर भी टूटा मुश्किलों का पहाड़
नाना की जिंदगी में पारिवारिक दुख भी कम नहीं रहे। उनके पिता का निधन उस समय हुआ जब नाना करीब 28 वर्ष के थे। परिवार पहले ही आर्थिक परेशानियों से गुजर रहा था। पिता को खोने का दर्द उनके जीवन पर गहरी छाप छोड़ गया।
नाना ने नीलकांति पाटेकर से विवाह किया। उनके दो बेटे हुए—दुर्वासा और मल्हार। परिवार को एक बड़ा सदमा तब लगा जब दुर्वासा का बचपन में ही बीमारी के कारण निधन हो गया। बाद में उनके बेटे मल्हार ने फिल्म निर्देशन से जुड़कर अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की।
गरीबी से निकला कलाकार, जिसने करोड़ों दिल जीते
मुश्किल परिस्थितियों ने नाना को तोड़ा नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और अभिनय को और धार दी। रंगमंच से शुरुआत के बाद उन्होंने फिल्मों में कदम रखा और धीरे-धीरे ऐसे कलाकार बने जिनके अभिनय के सामने संवादों से ज्यादा उनकी आंखें, आवाज और खामोशी बोलती थीं।
‘परिंदा’, ‘प्रहार’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अभय’, ‘खामोशी’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग किरदारों को यादगार बना दिया।
‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर सम्मान मिला। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए वर्ष 2013 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।
स्टार बने, लेकिन जमीन नहीं छोड़ी
नाना पाटेकर की जिंदगी का एक खास पहलू यह भी रहा कि अपार लोकप्रियता मिलने के बाद भी वह साधारण जीवन और ग्रामीण परिवेश से जुड़े रहे। खेती-किसानी और किसानों के मुद्दों से उनका जुड़ाव रहा। साथी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने नाम फाउंडेशन के जरिए किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए काम किया।
शायद यही वजह थी कि नाना के अभिनय में जिंदगी की वास्तविकता दिखाई देती थी। उन्होंने भूख देखी थी, संघर्ष देखा था, परिवार को टूटते देखा था और फिर अपने दम पर सफलता हासिल की थी।
एक ही तो दिल है… कितनी बार जीतोगे नाना?
आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संघर्ष उन लाखों युवाओं के लिए मिसाल रहेगा जो सीमित साधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं।
जिस बच्चे ने 13 साल की उम्र में घर की मजबूरी समझकर काम शुरू किया, वही आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली आवाजों में शामिल हुआ।
उनकी दहाड़, उनकी खामोशी, उनकी आंखों का दर्द और उनका बेबाक अंदाज पर्दे पर हमेशा जिंदा रहेगा।
आज सिनेमा ने अपना एक सच्चा ‘नाना’ खो दिया।
विनम्र श्रद्धांजलि।
नाना पाटेकर
1951–2026























































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